Saturday, 28 December 2013

ढाक के पत्ते और 'आप' के पत्ते!

---- क़मर वहीद नक़वी 

हर साल की तरह यह साल भी बीत रहा है. और जैसा कि हर साल होता है, इस साल भी एक नया साल आयेगा. साल चाहे कितना भी नया हो, अपना देश तो एक ही खटराग में बजता रहता है! वही कुरते, वही झंडे, वही गुंडे, वही डंडे, वही नारे, वही बहाने, वही नेता, वही जनता, वही तमंचे, वही चमचे, वही लाटसाहबी, वही जी हुज़ूरियाँ, वही तिजोरियाँ, वही लाचारियाँ, वही रैली-रैला, महारैला, हुँकार, महागर्जना, वही बलवे, वही फ़तवे, वही ढकोसले, वही खाप, वही ढाक के तीन पात! 

साल बदलते रहे, पीढ़ियाँ बदलीं. पार्टियों के पोस्टरों पर तसवीरें भी बदलीं. दो बैलों की जोड़ी एक दिन बदल कर गाय बछड़ा होते हुए हाथ बन जाती है और दीपक बुझ कर कमल बन जाता है! और भी बहुत कुछ बदलता है. समाजवाद की तीसरी धारा सरस्वती की तरह लुप्त हो जाती है और अपने आप से ही संघर्षरत साम्यवाद टूटते-बिखरते जाने कितने तम्बुओं में दुबक जाता है. बदलने को बहुत कुछ बदला. ज़रूर बदला. सारी शक्लें बदल गयीं. लेकिन जिसे बदलना था, वही नहीं बदला. न सत्ता का चरित्र बदला, न राजनीति की चाल बदली और न प्रेमचन्द के गोबर का चेहरा बदला! सब वहीं का वहीं रहा. वही ढाक के तीन पात!

अब दिल्ली में 'आप' की डुगडुगी बजी है. इस नये राजकौतुक ने अब तक तो राजनीति के बड़े-बड़े घिस्सू पहलवानों को अपने हर पैंतरे से अचकचाया है. जनता भी बड़ी उम्मीद से है. अब जो पार्टी चुनाव के बाद फिर से जनता से पूछने जाये कि काँग्रेस से समर्थन ले कर लँगड़ी सरकार बनायें या नहीं, उससे अगर जनता उम्मीद लगाये तो ग़लत क्या है? देश के लोकतंत्र में ऐसा प्रयोग पहली बार हो रहा है, जब जनता को इतना महत्त्व मिल रहा है! वैसे ऐसी ही एक उम्मीद आज से क़रीब अठाइस साल पहले भी जगी थी. जब 1985 में देश में पहली बार असम गण परिषद के बैनर तले छात्रों की सरकार बनी थी. लगा था कि ये सारे युवा एक जुझारू आन्दोलन से निकले हैं, जनता के ख़ून-पसीने का मर्म इनसे बेहतर भला और कौन समझेगा, शायद ये राजनीति की और जनहितकारी सत्ता की नयी लकीर खींच दें! लेकिन देखते ही देखते ये सत्ता के दलदल में समा गये. वही ढाक के तीन पात! 

'आप' ने जनता से जो चुनावी वादे किये हैं, उसे बैसाखियों पर टिकी उसकी सरकार कितना और कहाँ तक पूरा कर पाती है, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है. जितना कि यह कि वह राजनीति के अवसरवादी भँवरों से कैसे बचती है. जब तक सत्ता की पहुँच से वह दूर थी, तब तक तो सब ठीक था. लेकिन जैसे-जैसे लगने लगा कि काँग्रेस के समर्थन से ही सही, उसकी सरकार बन भी सकती है, तैसे-तैसे पार्टी में कई गिरगिट नज़र आने लगे! यह अच्छा नहीं लगा. और फिर जब तय हो गया कि पार्टी सरकार बनायेगी, मंत्रियों के नाम तय हुए, तो एक सज्जन बाग़ी हो गये. यह भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन इस घटना के बाद जब हमने पार्टी के बड़े नेताओं को मामले को दबाते-सँभालते, झूठ का ताना-बाना बुनते तमाम लीपापोती करते देखा, तो बड़ा झटका लगा. भई, केजरीवाल जी आप क्यों जनता को सच नहीं बता पाये कि विनोद कुमार बिन्नी इसलिए नाराज़ थे कि मंत्रियों की सूची में उनका नाम नहीं था! वैसे हमें पता चला कि अरविन्द केजरीवाल इस राय के नहीं थे कि बिन्नी को मनाया जाय क्योंकि सत्ता के लिए ललकने वालों को वह पार्टी में वैसे भी नहीं चाहते. लेकिन हुआ उलटा. पार्टी के दो नेताओं ने आख़िर रात भर की मेहनत के बाद बिन्नी साहब को मना लिया! कुर्सी बहुत दूर थी, लेकिन समझौते पहले शुरू हो गये! 'आप' में और बाक़ी पार्टियों में फ़र्क़ क्या रहा? क्या आप भी कुछ दिनों में वही नहीं बन जायेंगे? वही ढाक के तीन पात!

हालाँकि केजरीवाल एक मामूली से मुद्दे पर अपने सत्य को जिता नहीं सके, फिर भी हम जी-जान से प्रार्थना कर रहे हैं कि 'आप' के पत्ते ढाक के पत्ते न निकलें! 

और चलते-चलते, बात दो दंगों की. मुलायम सिंह को लगता है कि मुज़फ़्फरनगर के शरणार्थी शिविरों में अब कोई दंगापीड़ित नहीं रह रहा है. अब वहाँ शरणार्थियों के भेष में काँग्रेस और बीजेपी के षड्यंत्रकारी घुसे बैठे हैं! और वे समाजवादी सरकार को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के झूठे क़िस्से गढ़ रहे हैं! और उनके प्रिंसिपल होम सेक्रेटरी का कहना है कि इन शिविरों में ठंड से कोई नहीं मरा. वह कहते हैं कि ठंड से कोई नहीं मरता, वरना साइबेरिया की ठंड में कोई ज़िन्दा नहीं बचता! उधर, गुजरात में ज़किया जाफ़री की याचिका ख़ारिज हो गयी. किसी को हैरानी नहीं हुई! नरेन्द्र मोदी ने कहा, सत्यमेव जयते! सत्य ही जीतता है! लेकिन क्या किसी सत्य की हार नहीं हुई? गुलबर्ग सोसायटी में हुई घटना क्या सत्य नहीं थी? और अगर वह सत्य थी, तो क्या यह उसकी जीत है? मुलायम से मोदी तक सत्ता के 'अजेय सत्य' का एक ही चेहरा है. और जनता का सत्य सदा हारने के लिए अभिशप्त है. बार-बार, हर बार, वही ढाक के तीन पात!
(लोकमत समाचार, 28 दिसम्बर 2013)

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