Saturday, 28 December 2013

ढाक के पत्ते और 'आप' के पत्ते!

---- क़मर वहीद नक़वी 

हर साल की तरह यह साल भी बीत रहा है. और जैसा कि हर साल होता है, इस साल भी एक नया साल आयेगा. साल चाहे कितना भी नया हो, अपना देश तो एक ही खटराग में बजता रहता है! वही कुरते, वही झंडे, वही गुंडे, वही डंडे, वही नारे, वही बहाने, वही नेता, वही जनता, वही तमंचे, वही चमचे, वही लाटसाहबी, वही जी हुज़ूरियाँ, वही तिजोरियाँ, वही लाचारियाँ, वही रैली-रैला, महारैला, हुँकार, महागर्जना, वही बलवे, वही फ़तवे, वही ढकोसले, वही खाप, वही ढाक के तीन पात! 

साल बदलते रहे, पीढ़ियाँ बदलीं. पार्टियों के पोस्टरों पर तसवीरें भी बदलीं. दो बैलों की जोड़ी एक दिन बदल कर गाय बछड़ा होते हुए हाथ बन जाती है और दीपक बुझ कर कमल बन जाता है! और भी बहुत कुछ बदलता है. समाजवाद की तीसरी धारा सरस्वती की तरह लुप्त हो जाती है और अपने आप से ही संघर्षरत साम्यवाद टूटते-बिखरते जाने कितने तम्बुओं में दुबक जाता है. बदलने को बहुत कुछ बदला. ज़रूर बदला. सारी शक्लें बदल गयीं. लेकिन जिसे बदलना था, वही नहीं बदला. न सत्ता का चरित्र बदला, न राजनीति की चाल बदली और न प्रेमचन्द के गोबर का चेहरा बदला! सब वहीं का वहीं रहा. वही ढाक के तीन पात!

अब दिल्ली में 'आप' की डुगडुगी बजी है. इस नये राजकौतुक ने अब तक तो राजनीति के बड़े-बड़े घिस्सू पहलवानों को अपने हर पैंतरे से अचकचाया है. जनता भी बड़ी उम्मीद से है. अब जो पार्टी चुनाव के बाद फिर से जनता से पूछने जाये कि काँग्रेस से समर्थन ले कर लँगड़ी सरकार बनायें या नहीं, उससे अगर जनता उम्मीद लगाये तो ग़लत क्या है? देश के लोकतंत्र में ऐसा प्रयोग पहली बार हो रहा है, जब जनता को इतना महत्त्व मिल रहा है! वैसे ऐसी ही एक उम्मीद आज से क़रीब अठाइस साल पहले भी जगी थी. जब 1985 में देश में पहली बार असम गण परिषद के बैनर तले छात्रों की सरकार बनी थी. लगा था कि ये सारे युवा एक जुझारू आन्दोलन से निकले हैं, जनता के ख़ून-पसीने का मर्म इनसे बेहतर भला और कौन समझेगा, शायद ये राजनीति की और जनहितकारी सत्ता की नयी लकीर खींच दें! लेकिन देखते ही देखते ये सत्ता के दलदल में समा गये. वही ढाक के तीन पात! 

'आप' ने जनता से जो चुनावी वादे किये हैं, उसे बैसाखियों पर टिकी उसकी सरकार कितना और कहाँ तक पूरा कर पाती है, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है. जितना कि यह कि वह राजनीति के अवसरवादी भँवरों से कैसे बचती है. जब तक सत्ता की पहुँच से वह दूर थी, तब तक तो सब ठीक था. लेकिन जैसे-जैसे लगने लगा कि काँग्रेस के समर्थन से ही सही, उसकी सरकार बन भी सकती है, तैसे-तैसे पार्टी में कई गिरगिट नज़र आने लगे! यह अच्छा नहीं लगा. और फिर जब तय हो गया कि पार्टी सरकार बनायेगी, मंत्रियों के नाम तय हुए, तो एक सज्जन बाग़ी हो गये. यह भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन इस घटना के बाद जब हमने पार्टी के बड़े नेताओं को मामले को दबाते-सँभालते, झूठ का ताना-बाना बुनते तमाम लीपापोती करते देखा, तो बड़ा झटका लगा. भई, केजरीवाल जी आप क्यों जनता को सच नहीं बता पाये कि विनोद कुमार बिन्नी इसलिए नाराज़ थे कि मंत्रियों की सूची में उनका नाम नहीं था! वैसे हमें पता चला कि अरविन्द केजरीवाल इस राय के नहीं थे कि बिन्नी को मनाया जाय क्योंकि सत्ता के लिए ललकने वालों को वह पार्टी में वैसे भी नहीं चाहते. लेकिन हुआ उलटा. पार्टी के दो नेताओं ने आख़िर रात भर की मेहनत के बाद बिन्नी साहब को मना लिया! कुर्सी बहुत दूर थी, लेकिन समझौते पहले शुरू हो गये! 'आप' में और बाक़ी पार्टियों में फ़र्क़ क्या रहा? क्या आप भी कुछ दिनों में वही नहीं बन जायेंगे? वही ढाक के तीन पात!

हालाँकि केजरीवाल एक मामूली से मुद्दे पर अपने सत्य को जिता नहीं सके, फिर भी हम जी-जान से प्रार्थना कर रहे हैं कि 'आप' के पत्ते ढाक के पत्ते न निकलें! 

और चलते-चलते, बात दो दंगों की. मुलायम सिंह को लगता है कि मुज़फ़्फरनगर के शरणार्थी शिविरों में अब कोई दंगापीड़ित नहीं रह रहा है. अब वहाँ शरणार्थियों के भेष में काँग्रेस और बीजेपी के षड्यंत्रकारी घुसे बैठे हैं! और वे समाजवादी सरकार को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के झूठे क़िस्से गढ़ रहे हैं! और उनके प्रिंसिपल होम सेक्रेटरी का कहना है कि इन शिविरों में ठंड से कोई नहीं मरा. वह कहते हैं कि ठंड से कोई नहीं मरता, वरना साइबेरिया की ठंड में कोई ज़िन्दा नहीं बचता! उधर, गुजरात में ज़किया जाफ़री की याचिका ख़ारिज हो गयी. किसी को हैरानी नहीं हुई! नरेन्द्र मोदी ने कहा, सत्यमेव जयते! सत्य ही जीतता है! लेकिन क्या किसी सत्य की हार नहीं हुई? गुलबर्ग सोसायटी में हुई घटना क्या सत्य नहीं थी? और अगर वह सत्य थी, तो क्या यह उसकी जीत है? मुलायम से मोदी तक सत्ता के 'अजेय सत्य' का एक ही चेहरा है. और जनता का सत्य सदा हारने के लिए अभिशप्त है. बार-बार, हर बार, वही ढाक के तीन पात!
(लोकमत समाचार, 28 दिसम्बर 2013)

Saturday, 21 December 2013

'आप' आये, तो लोकपाल बन जाये!

जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला! किसी ज़माने में लखनऊ के नवाब रहे आसफ़ुद्दौला के बारे में यह बात कही जाती है. लखनऊ का मशहूर बड़ा इमामबाड़ा उन्होंने ही बनवाया था. सही या ग़लत, लेकिन क़िस्सा है कि अवध में उनके ज़माने में बड़ा भयंकर सूखा पड़ा था. लोग दाने-दाने को मुहताज हो गये. तब नवाब आसफ़ुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाने का काम शुरू किया. कहते हैं कि इमामबाड़े का निर्माण कार्य रात में किया जाता था ताकि कभी शान-शौकत में जी चुके शरीफ़ घरों के लोग भी वहाँ इज़्ज़त बचा कर काम कर सकें, दो पैसे कमा सकें और किसी को पता भी न चले कि वे मज़दूरी करने पर मजबूर हैं!

वह आसफ़ुद्दौला का ज़माना था. आसफ़ुद्दौला ने लोगों को किस बहाने क्या दिया, किसी को पता नहीं चला. आज केजरीवाल के बहाने हम ग़रीबों को  लोकपाल मिल जाता है! क्यों भला? इसलिए कि केजरीवाल की लकीर छोटी करने के लिए अन्ना की लकीर को बड़ा तो करना पड़ेगा न. इस केजरीवाल ने 'आप-आप' कर दिल्ली में ऐसी झाड़ू फेरी कि बीजेपी और काँग्रेस दोनों के दम फूल गये. काँग्रेस तो सब जगह चारों ख़ाने चित थी, लेकिन बीजेपी के अँधड़ को 'आप' ने ऐसा नापा कि पार्टी की घिग्घी बँध गयी और अानन-फ़ानन में लोकपाल पास हो गया! नेहरू जी के ज़माने से कोशिश चल रही थी. केजरीवाल के ज़माने में आ कर पूरी हुई! पूरे पचास साल लग गये! जो काम पचास साल में कई बार होते-होते रह गया, वह देखते ही देखते पाँच दिनों में हो गया! ख़ुशी-ख़ुशी अन्ना का अनशन टूटा. सबने तालियाँ पीटीं, सरकार ने, राहुल ने, काँग्रेस ने, बीजेपी ने कि देखो ऐ मेरे वतन के लोगो, देखो, अन्ना को जैसा लोकपाल चाहिए था, वैसा मिल गया न! किसने दिया? हमने दिया, हमने दिया, हमने दिया!

अब केजरीवाल कहते रहें कि यह लोकपाल नहीं, जोकपाल है. कम से कम अन्ना तो खड़े हो कर बोल ही रहे हैं कि नहीं भई, यह वही ख़ालिस रामलीला मैदान वाला असली लोकपाल है, जिसके लिए उन्होंने अनशन किया था, जो भ्रष्टाचार ख़त्म कर देगा, काले धन का काल बनेगा! काले धन का काल बने न बने, झाड़ू का काल ज़रूर बन जाये! चुनाव सिर पर न सवार होते और केजरीवाल के 'आप' के ताप से सबकी कँपकँपी न छूट रही होती तो लोकपाल की गाड़ी फिर छूट गयी होती. वरना ऐसी क्या मुसीबत थी कि लोकपाल के लिए हाथ और कमल को एक-दूसरे से गलबहियाँ करनी पड़ीं. कमल वाले नमो जी ने तो तब तक अपने प्यारे गुजरात में लोकायुक्त को पधारने नहीं दिया जब तक पानी बिलकुल नाक तक नहीं आ गया. फिर केन्द्र में लोकपाल को लेकर इतनी हबड़-तबड़ क्यों? इसलिए कि 'आप' की बिल्ली कहीं मुख्य से प्रधान होने का रास्ता न काट जाये!

मामला साफ़ है. कोई नहीं चाहता कि केजरीवाल के पास भ्रष्टाचार का नाम लेने का भी कोई चाँस रह जाये. इसीलिए दोनों बड़ी पार्टियों में इतना ज़बरदस्त एका दिखा. और यह एका सिर्फ़ लोकपाल ही नहीं, बल्कि दिल्ली में सरकार बनवाने में भी है. दोनों पार्टियाँ चाहती हैं कि कैसे भी, बस एक बार 'आप' सरकार बना ले. उसे हर तरफ़ से घेरा जा रहा है. कैसे भी जाल में फँसे और सरकार बनाये. फिर दोनों पार्टियाँ मिल कर अगले महीने-दो महीने में उसकी सरकार फ़ेल करा दें. ताकि लोकसभा चुनाव से पहले ही किसी प्रकार 'आप' को निकम्मी, अराजक, अविश्वसनीय, हुड़दंगी टोली साबित कर उसे जनता की नज़र से उतार दिया जाये.

'आप' से इतना डर क्यों? वजह दो हैं. एक तो यह कि जनता पर उसका असर बढ़ रहा है. नये-नये इलाक़ों में 'आप' का रंग दिखने लगा है. उसे इतने वोट मिले न मिलें कि वह अपने बूते कुछ कर पाये, लेकिन इतना तय है कि दिल्ली की तरह वह कई इलाक़ों में जमे-जमाये समीकरण और बने-बनाये गणित की ऐसी-तैसी कर सकती है. दूसरी वजह इससे भी बड़ी है. 'आप' जितने समय तक भी देश के राजनीतिक पटल पर है, तब तक वह सबके लिए नैतिकता की लक्ष्मण रेखा बनी रहेगी. इतना बड़ा सिरदर्द आख़िर ये घुटी घाघ पार्टियाँ कैसे झेलती रहेंगी. साफ़ हवा में इनका दम जो घुटता है और हाथ-पैर चलने बन्द हो जाते हैं. अगर ऐसा न होता, तो दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी हो कर भी बीजेपी ने क्यों सरकार बनाने के लिए ज़रा भी लार नहीं टपकायी? वह चुपचाप रामनामी ओढ़ कर बैठी रही कि विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त और जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनायेंगे. राजनीति में ऐसी पवित्रता और शुचिता के संकल्प तो पहली बार ही हमने देखे. वरना तो इसी बीजेपी ने पिछले आठ सालों में झारखंड में सत्ता के लिए क्या-क्या करतब नहीं किये और इसी पार्टी ने छह फ़ीसदी वोटों के लालच में उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मायावती की पार्टी से भ्रष्टाचार के लिए निकाले गये नेता जी को बाजे-गाजे के साथ कैसे पार्टी में शामिल किया था, यह कौन नहीं जानता!

इसीलिए 'आप' से सबको डर लगता है. क्योंकि यह ख़ुद खेल पाये या न पाये, बाक़ी सबके लिए खेल के नियम बदल देती है. इसीलिए सब मिल कर 'आप' को निहत्था करना चाहते हैं. चलो! इस बहाने ही सही, देश को लोकपाल तो मिला! और केजरीवाल चाहे जो कहें, कम से कम यह लोकपाल निहत्था तो नहीं लगता.
(लोकमत समाचार, 21 दिसम्बर 2013)

Saturday, 14 December 2013

जब जनता आती है और ठगी जाती है!

सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है! देश के पहले गणतंत्र दिवस के मौक़े पर रामधारी सिंह 'दिनकर' ने यह कविता लिखी थी. उसके चौबीस साल बाद उनकी यह पंक्ति जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन का नारा बन कर गली-गली गूँजी थी. अब दिल्ली में 'आप' के चमत्कार के बाद ऐसा लगता है कि जनता एक बार फिर अपना सिंहासन पाने के लिए फिर मचल उठी है! लेकिन सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं. क्या हर बार की तरह एक बार फिर लुटी-पिटी और ठगी हुई जनता को सत्ता के दरवाज़े से दुरदुरा कर भगा दिया जायेगा? पिछले दो सालों से देश की जनता में बड़ी बेचैनी दिख रही है. अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन से जनता उठ खड़ी हुई थी. भ्रष्टाचार ख़त्म हो, जनता का राज हो. न भ्रष्टाचार ख़त्म हुआ, न जनता का राज आया, न लोकपाल बना. अन्ना ज़रूर दिल्ली से अपना बोरिया-बिस्तर लेकर अपने गाँव रालेगण सिद्धि पहुँच गये और अब वहीं अनशन कर रहे हैं. हाँ, उस आन्दोलन से टूट कर आम आदमी पार्टी ज़रूर बन गयी, जो दिल्ली के बाद अब लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रही है. लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि 'आप' यानी कि आम आदमी पार्टी क्या सचमुच राजनीति में कोई बदलाव ला पायेगी, क्या वाक़ई सत्ता में आम आदमी को हिस्सेदारी मिल पायेगी, क्या पार्टी के पास कोई ठोस राजनीतिक दृष्टि है, क्या उसके पास देश की समस्याओं का कोई ठीकठाक हल है या फिर महज़ नारों के गुब्बारे ही हैं, जिनसे भीड़ को कुछ देर बहलाया ही जा सकता है, बस. 

1974 के दिन याद आ रहे हैं. हालात तब भी कमोबेश आज जैसे ही थे. महँगाई थी, भ्रष्टाचार था, सत्ता निरंकुश थी, जनता त्रस्त थी, कहने को लोकतंत्र था, लेकिन लोक पूरी तरह ग़ायब हो चुका था, सिर्फ़ तंत्र ही तंत्र बचा था, जो देश को किधर हाँक रहा था, किसी को पता नहीं था. ऐसे में गुजरात से छात्रों का 'नवनिर्माण आन्दोलन' शुरू हुआ और देखते ही देखते वह बिहार पहुँचा और 'सम्पूर्ण क्रान्ति' का नारा बुलन्द हो गया. जेपी यानी जयप्रकाश नारायण के पीछे सारा देश खड़ा हो गया. वह लोकनायक कहलाये जाने लगे. और आख़िर जनता की ताक़त ने इमर्जेन्सी के तमाम दमन को बर्दाश्त करते हुए भी इन्दिरा गाँधी के शासन का ख़ात्मा कर दिया. 

जनता जीत गयी थी. दिल्ली की सरकार बदल गयी थी. लेकिन सम्पूर्ण क्रान्ति के सपने की गठरी के साथ जनता और जेपी दोनों किनारे लगाये जा चुके थे. राजनीति ने उन्हें ठग लिया था, ठीक वैसे ही जैसे आज़ादी के बाद गाँधी ठगे हुए हाथ मलते रह गये थे! हालाँकि आज़ादी मिलने के कुछ सालों तक लोगों को यह भरम ज़रूर बना रहा कि जनता का राज आ चुका है. वरना 26 जनवरी 1950 को देश का पहला गणतंत्र मनाने के लिए 'दिनकर' यह न लिखते कि 'सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!' 

1947 में जनता आयी थी, उसने अँगरेज़ों से सिंहासन ख़ाली करा लिया और लकदक खादी कुरते वाले वहाँ विराजमान हो गये. राजकाज चलने लगा, लोकतंत्र आ गया था, इसलिए नेता राजा हो गये, जनता वैसे ही 'परजा' बनी रही और गाँधी 'महात्मा' बना कर अपने आश्रम में सिमटा दिये गये! गोडसे की गोली के काफ़ी पहले ही तंत्र गाँधी को मार चुका था! 

फिर 1988 में एक बार फिर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने देश को मथा. बोफ़ोर्स तोपों का मामला गूँजा. वी. पी. सिंह के पीछे जनता फिर खड़ी हुई. नारा गूँजा, 'राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है!' एक बार फिर लगा कि भ्रष्टाचार हारेगा, ग़रीब जीतेगा, व्यवस्था में बुनियादी बदलाव होंगे. लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति में देश ऐसा बँटा कि सब बंटाधार हो गया!

और अब 'आप' की डुगडुगी बज रही है. जनता ने फिर उम्मीदें रोपनी शुरू की हैं. बहुत-से लोगों को लगता है कि परम्परागत राजनीति के ढर्रों को अगर कभी कोई ध्वस्त कर सकता है, वह 'आप' जैसा संगठन ही हो सकता है, जिसके लोग 'पेशेवर' राजनेता नहीं़, बल्कि सचमुच हमारे अड़ोस-पड़ोस के आम आदमी हैं. ऐसा मानना और समझना ग़लत नहीं. लेकिन 'आप' को इतिहास से सीखना चाहिए. अरविन्द केजरीवाल न गाँधी हैं, न जेपी और न ही वीपी. गाँधी और जेपी तो ख़ैर बहुत बड़ी चीज़ थे और उनकी दृष्टि, दर्शन और राजनीतिक-सामाजिक सूझ-बूझ के मामले में कोई दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरता. फिर भी इतिहास गवाह है कि ये दोनों सत्ता के राजनीतिक कुचक्र के हाथों बुरी तरह ठगे गये. वीपी ख़ुद राजनीति के खिलाड़ी थे, लेकिन वह अपनी ही राजनीति के भँवर में ऐसे फँसे कि ख़ुद ही डूब गये! कुछ और भी उदाहरण हैं. जैसे अन्ना हज़ारे, जिनके साथ जुटी भीड़ देख कर तंत्र का दम फूल गया, लेकिन आख़िर उन्हें भी उसने अपने मकड़जाल में उलझा कर समेट दिया! केजरीवाल ने अभी तक सपने तो ख़ूब बेचे, लेकिन वे पूरे कैसे होंगे, यह वह साफ़ नहीं करते. उन्हें चाहिए कि वह देश को विस्तार से बतायें कि उनके पास क्या कार्ययोजना है, आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-वैश्विक मोर्चे पर उनकी नीतियाँ क्या होंगी और वे नीतियाँ मौजूदा व्यवस्था के मुक़ाबले कैसे बेहतर होंगी, वे तंत्र को कैसे दुरुस्त करेंगे? वरना जनता एक बार फिर ठगी जायेगी और उनमें व दूसरे राजनीतिक दलों में क्या अन्तर रह जायेगा जो हर पाँचवे साल जनता को ठगते हैं?
(लोकमत समाचार, 14 दिसम्बर 2013)

Saturday, 7 December 2013

अतीत में जमी जड़ें और भविष्य का पेड़!

आज कुछ बात सिर्फ़ और सिर्फ़ युवाओं से! कभी सिर्फ़ अमिताभ बच्चन 'एंग्री यंगमैन' हुआ करते थे. वह पुराना ज़माना था. आज तो जितने 'यंग' हैं, सभी 'एंग्री' हैं. चारों तरफ़ ग़ुस्सा ही ग़ुस्सा ही दिखता है. तनतनाये हुए युवा! भन्नाये हुए युवा! निराश, हताश, बेचैन, बे-आस. वे बड़ी नौकरियाँ कर रहे हों या अभी रोज़गार की तलाश में हों, ठीक-ठीक कमा-खा रहे हों या अभी पढ़ाई में ही लगे हों, युवाओं का मूड बहुत बिगड़ा हुआ है!

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हर तरफ़ यह ग़ुस्सा, यह कसमसाहट, यह छटपटाहट दिखती है. ऐसा लगता है कि हम सब किसी भयानक जंगल में फँस गये हों, अँधेरा घना और भुतहा हो, चारों तरफ़ बीहड़ कँटीली झाड़ियाँ हों और कहीं कोई रास्ता न हो, कहीं कोई रोशनी न हो. 

हालाँकि तसवीर का दूसरा पहलू यह है कि आज देश की साक्षरता दर 74 प्रतिशत से भी ज़्यादा है. पहले से कई गुना अधिक नौकरियाँ हैं, बेरोज़गारी पहले से कहीं कम है, पढ़ने-लिखने के और विदेशों में जा कर नौकरियाँ करने के तमाम अवसर हैं. फिर क्यों इतनी हताशा है? हमें आज़ादी मिले 66 साल हुए हैं. इस यात्रा को हम अगर दो हिस्सों में बाँट दें तो आज़ादी के 33 साल बाद यानी 1980 में हमारी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 266 डालर थी, जो 2012 में बढ़ कर 1492 डालर हो गयी. यानी पाँच गुना ज़्यादा! यह आँकड़ा किसी सरकार की सफलता-असफलता गिनाने के लिए नहीं दिया जा रहा है, बल्कि 1980 के बाद जन्मे युवाओं को यह बताने के लिए दिया जा रहा है कि आप अगर थोड़ा पीछे मुड़ कर देख लें तो आपको अपना वर्तमान उतना कँटीला नहीं लगेगा.
मुझे लगता है कि मूल समस्या यही है कि अब कोई पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहता!

आज सूचना क्रान्ति का ज़माना है. हर जानकारी एक क्लिक पर हाज़िर. लेकिन सूचनाओं की इस सुनामी की हाहाकारी अफ़रातफ़री के बीच सत्य, तथ्य और इतिहास अकसर किसी को दिख ही नहीं पाते! इसलिए अकसर यह होता है कि हमें दुनिया में अपने सिवा सब कुछ बहुत चमकीला दिखता है. चाहे भले ही यह चमक सिर्फ ऊपर से चढ़ाये गये सोने के पानी जैसी हो, जो हमें उस समय चौंधिया तो देती है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह तो पीतल का माल था. बेकार!

कई बार यह चमक असली भी हो सकती है, होती है. हम कहते हैं 'वाॅव'....'आॅसम'. लेकिन हमें यह एहसास कहाँ कि ठहर कर यह देखें कि इस 'वाॅव फ़ैक्टर' को पाने में कितने बरस की कड़ी मेहनत, अनुशासन, लगन लगी है. थोड़ा पीछे मुड़ कर देखेंगे तो पायेंगे कि किसी भदेस, खुरदुरी, बदरंग स्थिति को बदल कर 'आॅसम' बना देने की कहानी कितनी लम्बी, जीवटभरी है और उसमें कितने लाखों अनाम गुमनाम सितारों का ख़ून-पसीना लगा है. कभी आपने सोचा कि अगर वह अतीत न होता तो क्या यह वर्तमान सम्भव था?
यह 'स्पीड एज' है. आप वैज्ञानिक क्रान्ति के उस मोड़ पर पैदा हुए हैं, जहाँ कोई मशीन, कोई तकनालाॅजी, कोई डिवाइस, कोई थ्योरी, कोई खोज ज़्यादा दिन नहीं ठहर सकती, जो आज बहुत महान है, कल उसकी जगह रद्दी की टोकरी में ही है. लेकिन फिर भी यह बुनियादी बात तो समझनी पड़ेगी कि अतीत से सीखे बिना आप भविष्य नहीं गढ़ पायेंगे! 

आज जब मैं देखता हूँ तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स को, तो दिल बैठता है. युवाओं की आँखों में तैरते सपनों के बजाय विक्षोभ का गर्द-ग़ुबार, आक्रोश की लपटें, तिरस्कार का लावा और घृणा का कीचड़ दिखता है. विक्षोभ और आक्रोश इसलिए कि उन्हें लगता है कि राजनीति सड़ चुकी है और सरकारें चला रहे लोग सिर्फ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उन्हें देश की नहीं केवल अपनी जेबें भरने की फ़िक्र है. अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुसलमान में बँटी ज़हरीली मानसिकता पहले से कहीं मुखर दिखती है क्योंकि हर वर्ग के युवाओं को लगता है कि वे उन अवसरों से वंचित हो रहे हैं, जिन पर उनका हक़ है. उन्हें लगता है कि उनकी पुरानी पीढ़ियाँ मूर्ख और फिसड्डी थीं, इसलिए जो कुछ भी पुराना है, वह तिरस्कार योग्य है.

लेकिन क्या यही सच है? आप पिछली पीढ़ियों से कहीं ज़्यादा उन्नत हैं, कहीं ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं और कहीं ज़्यादा सूचनाएँ आपके हाथ में हैं. होना तो यह चाहिए था कि सत्य और तथ्य आपको पानी की तरह साफ़ दिखना चाहिए था. लेकिन क्या सचमुच ऐसा हो पा रहा है? नहीं. अगर ऐसा होता तो एक बटा दो, दो बटा चार वर्तमान सामने न होता और भविष्य ऐसा कुम्हलाया हुआ न लगता!

आपके इतिहास और वर्तमान में बहुत कुछ अच्छा भी है और कुछ बुरा भी. यह तय आपको करना है कि आप अपना भविष्य बनाने के लिए अपने अतीत और वर्तमान से क्या चुनते हैं---अच्छाइयों को या बुराइयों को? अब यह तो एक बच्चा भी बता देगा कि आप इनमें से जिसे चुनेंगे, भविष्य वैसा ही बनेगा! आप तो बच्चों से ज़्यादा समझदार हैं! हैं न! 

और अन्त में एक और बात. अतीत से आप सिर्फ सीखते ही नहीं. वहाँ आपकी जड़ें होती हैं. पेड़ कितना भी ऊँचा हो, आसमान छूता हो, फिर भी जड़ें मिट्टी के भीतर गहरे अँधेरों में दबी होती हैं और पेड़ को ज़िन्दा रहने के लिए भोजन पहुँचाती रहती हैं. इसलिए अतीत में जमी जड़ों के बिना भविष्य का पेड़ खड़ा नहीं हो सकता!
(लोकमत समाचार, 7 दिसम्बर 2013)

Saturday, 30 November 2013

कौन डरता है शहर की औरतों से?

एक गाना था. झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो. लेकिन अपने देश में काटनेवाले कौवे कभी दिखे नहीं. इसलिए सच बोलनेवाले भी अकसर कम ही दिखते हैं! कम दिखते हैं या बिलकुल विलुप्त हो चुके हैं, इस पर बड़े-बड़े सेमिनार हो सकते हैं और तब भी शायद यह तय न हो पाये कि आज के दौर में कोई सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहीं बचा है या नहीं! क्योंकि सच यह है कि जो भी, जहाँ भी, जब भी, जैसे भी झूठ बोल सकने की रत्ती भर भी हैसियत रखता है, वह मौक़ा नहीं चूकता. कहते हैं कि झूठ सफ़ेद रंग का होता है. इसलिए आजकल कुछ नेताओं ने सफ़ेद कुरते पहनने छोड़ दिये! अब कुरते रंगीन हो गये तो क्या बातों का रंग भी बदल जायेगा? 
लेकिन श्रीमान, हमारे नेता कभी-कभी सच भी बोलते हैं! मज़ाक़ नहीं, सच! वे किसी कौवे-औवे से नहीं डरते. फिर भी कभी-कभार सच बोल बैठते हैं. ग़लती से. और जब ग़लती हो जाती है, तो माफ़ी भी माँगनी पड़ती है. अब न उन्हें वोट माँगते शर्म आती है और न माफ़ी माँगते. सो आज माफ़ी माँगी, कल फिर ग़लती से सच बोल गये, फिर माफ़ी माँगी, अगली बार फिर वही सच ज़बान से ग़लती से फिसल पड़ा तो फिर माफ़ी.....सिलसिला चलता रहता है, ग़लती कभी दुरुस्त नहीं होती! 
पढ़ कर आप थोड़ा हैरान-परेशान होंगे. ऐसा कौन-सा सच है जो छिपाये छिपता नहीं, दबाये दबता नहीं? सुनते हैं, कुछ रोग होते हैं, लाख दवाई करो, दब-दब कर उभर आते हैं. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है. आ से आदमी, औ से औरत! जब उन्हें यह रट्टा रटाया गया था, तब बच्चों की किताबों की तसवीरों में औरतें गज़ भर लम्बी घूँघटों में छपती थीं. आ से आदमी यानी एक अड़ियल-कड़ियल मर्द की तसवीर. औ से औरत, यानी घूँघट और लाज के वज़न से दोहरी होती कपड़ों की एक पोटलीनुमा औरत की तसवीर. बस उन्हें अब तक यही याद है कि औरत घूँघट में ही रहती है! 
इसलिए कभी किसी बड़े पुराने घिस्सू समाजवादी को वे 'परकटी' नज़र आने लगती हैं, क्योंकि वे संसद में महिला आरक्षण की ज़ोर-शोर से माँग कर रही थीं! कभी महामहिम राष्ट्रपति जी के पुत्र को वे 'डेंटेड-पेंटेड' दिखने लगती हैं, क्योंकि उन्हे अच्छा नहीं लगता कि महिलाएँ बलात्कार के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जलायें! कोलकाता में जब बलात्कार होता है, तो ग़रीबों की ममता से भरी सर्वदा-जुझारू दीदी को भी शहरी लड़कियों के पहनावे और चाल-ढाल में ही खोट नज़र आता है. उधर, सब कुछ भगवा-भगवा देखनेवाले संघ के मुखिया भी बड़े होमवर्क के बाद खोज करते हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध शहरों में होते हैं, सब पश्चिमी संस्कृति का दोष है, गाँवों में कहाँ कोई बलात्कार होता है भला? उन्हीं के 'परिवार' के एक पूर्व-प्रचारक और अब नये-नवेले विकासवाचक जी ने एक दिन लोगों से पूछा कि इस देश में कभी किसी ने 50 करोड़ की गर्ल फ़्रेंड देखी है! देखा आपने, इस मामले में क्या ज़बर्दस्त एका है. समाजवादी हों, संघी हों या काँग्रेसी या कोई और---सबको लगता है कि पढ़ी-लिखी शहरी औरतें ही सारी मुसीबत की जड़ हैं! क्यों? क्या इसका जवाब इतना मुश्किल है?
और अब तरुण तेजपाल काँड के बाद फिर कुछ 'महिला-हितैषी' चिन्तित हो उठे हैं. एक हैं नरेश अग्रवाल. उत्तर प्रदेश के हैं. कितनी पार्टियाँ बदल चुके, उन्हें भी याद न होगा. वह कहते है कि इस विवाद से अब लड़कियों को नौकरी मिलना मुश्किल हो जायेगा! लोग डरने लगे हैं कि लड़कियों को नौकरी दी तो कौन जाने कब यौन शोषण के आरोप में फँस जायें! अग्रवाल जी कहना क्या चाहते हैं? यौन शोषण होता है तो लड़कियाँ चुपचाप सहती रहें, बोले नहीं! उनकी बात का तो यही एक मतलब निकलता है! 
औरतें जब तक चुपचाप सहती रहें, तब तक सब ठीक है. बात हमेशा परदे में रहती है! इसीलिए संघ वालों को लगता है कि गाँवों और छोटे शहरों वाले 'भारत' में सब कुछ ठीकठाक चलता है. क्योंकि लाज और घर की नाक का लिहाज़ तोड़ कर औरतें बोल नहीं पाती कि उन्हें कब क्या चुपचाप पी जाना पड़ा. फिर भी जनाब, उन इलाकों में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध का ग्राफ़ कहीं से कम नहीं. हाँ, वहाँ सब चुपचाप निपटा दिया जाता है! लेकिन शहर की महिलाएँ बोलने लगी हैं, अपनी मौजूदगी हर जगह दर्ज कराने लगी हैं, इसलिए प्रभुजनों को अपना आसन डोलते हुए दिखने लगा है. हुज़ूर, अभी तो अपने देश में काम करनेवाली आबादी में महिलाओं का हिस्सा 22 फ़ीसदी से कुछ ही ज़्यादा है और इस मामले में 131 देशों में भारत नीचे से 11वें नम्बर पर है. अगर अभी से आप दुबले होने लगे, तो तब क्या होगा जब महिलाएँ नौकरी में आधा हिस्सा माँगेंगी. आपकी सूचना के लिए बता दें कि नार्वे में कामकाजी आबादी में महिलाओं का हिस्सा 69 प्रतिशत है. तो कुँए से बाहर निकल कर देखिए कि आसमान का विस्तार कितना अनन्त है!
(लोकमत समाचार, 30 नवम्बर 2013)

Saturday, 23 November 2013

कहिए और लड़िए ताकि भविष्य निराश न हो!

यह संस्थाओं के ध्वस्त होने का समय है! विश्वासों और सम्बलों के आख़िरी बचे-खुचे कुछ पायदानों के चरमराने-दरकने-धसकने का वर्तमान बीतने को है, सब कुछ भरभरा कर ढह जाने का भविष्य बस जैसे आ टपकने की ही घात में है. लोकतंत्र के चार खम्भे! दो बस अब ढहे, तब ढहे. अफ़सरशाही और नेताशाही से किसी को शायद ही कोई उम्मीद हो. बाक़ी बचे दो, अदालत और मीडिया. गिरते-पड़ते भी इनकी साख से कुछ आस तो बची ही थी. वैसे ही जैसे डूबते को तिनके का सहारा! 
लेकिन पिछले एक हफ़्ते में दोनों पर बड़ा बट्टा लगा! देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सियों पर भी ऐसे लोग बैठ सकते हैं, जिन पर यौन शोषण के लाँछन लगें! फिर 'तहलका' के नामी-गिरामी सम्पादक तरुण तेजपाल पर अपने एक पत्रकार मित्र की बेटी और अपनी ही सहकर्मी पत्रकार पर यौन आक्रमण के आरोप से तहलका मच गया! 
इन दोनों मामलों में क्या होगा, दोषियों को सज़ा मिल पायेगी या नहीं, मिलेगी तो कितनी मिलेगी, आरोप साबित हो पायेंगे या वापस ले लिये जायेंगे, जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता रहता है! ये सब सवाल हैं. बहस जारी है. तेजपाल के 'प्रायश्चित' को दर्ज कर 'फ़र्ज़' पूरा कर लिया जाये या मामले को क़ानून के हाथों सौंपा जाये? अब तेजपाल 'इलीट' सम्पादक हैं, इसलिए बहस हो रही है! सुनते थे क़ानून सबके लिए बराबर होता है. किताबों में तो होता है, लेकिन बस पढ़ने के लिए! जब करने की बात हो तो बड़े आदमी के लिए क़ानून छोटा हो जाता है. जितना बड़ा आदमी, उतना बौना क़ानून! लेकिन तेजपाल साहब 'बड़े' हो कर भी शायद जल्दी नप जायें. इसलिए नहीं कि देश में अचानक सुराज आ गया, बल्कि इसलिए कि बारह साल से जली-भुनी बैठी बीजेपी के हाथ बटेर लग गयी. गोवा में उसकी सरकार है, अपराध गोवा में हुआ है, उसकी पुलिस ने मामला हाथ में ले लिया है. कम से कम बंगारू लक्ष्मण का बदला तो चुका ही लेगी बीजेपी! अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे! वैसे काँग्रेस ने भी तेजपाल की गिरफ़्तारी की माँग कर दी है. चुनाव का मौसम है! कोई पार्टी रिस्क नहीं ले सकती! यह सब राजनीति की चकल्लस अपनी जगह, पर इस मामले में दो राय नहीं हो सकती कि तेजपाल पर गम्भीर आपराधिक आरोप लगे हैं और क़ानून अपना काम करे, इसके अलावा और कोई बात क़ानून सम्मत नहीं हो सकती.
लोग सकते में हैं! अभी तक बड़ी अदालतों के कुछ फ़ैसलों पर कभी-कभी हैरानी होती थी, कभी-कभार कुछ बदरंग बातें भी इधर-उधर से छन-छना कर बाहर आ जाती थीं. मीडिया पर भी बड़े धब्बे लगे हाल के दिनों में. पेड न्यूज़ और बाज़ारूपन के अलावा राडिया टेपों ने कई बड़े नामों की क़लई उतार दी. यह अलग बात है कि उनमें से सभी अब भी वैसे ही जमे हुए हैं, इज़्ज़त की पूरी गठरी के साथ! लेकिन फिर भी लोगों को इन दोनों 'खम्भों', अदालत और मीडिया से कहीं न कहीं बड़ी आस थी. लेकिन अब इन दो मामलों ने कुछ और छिलके उतार दिये. नेताशाही अगर भ्रष्ट है, राजनीति अगर किसी भी स्तर तक गिर सकती है, तो उस पर लगाम कौन लगायेगा? सवाल कौन उठायेगा? किस मुँह से उठायेगा? कड़ुवे और तीखे सवाल पूछने का क्या नैतिक आधार होगा उसके पास? क्या उससे पलट कर सवाल नहीं पूछा जायेगा कि तुम कौन होते हो उँगली उठानेवाले, तुम्हारे कपड़ों पर भी सत्तर दाग़ हैं, जैसे हम, वैसे तुम. तुम भी खेलो हमारे साथ. हम चारो मौसेरे भाई! 
सबसे ख़तरनाक यही है. अफ़सरशाही, नेताशाही, न्यायपालिका और मीडिया अगर सब दुर्भाग्य से एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखने लगे, तब? कुछ नहीं बचेगा तब. बेचारगी में, लाचारी में लोग सड़कों पर उतरेंगे, उतरे भी थे पिछले दिनों, जनलोकपाल को लेकर और 'निर्भय' को न्याय दिलाने. 'निर्भय' आन्दोलन पूरी तरह सफल रहा. छोटी अवधि का था. लेकिन जनलोकपाल की लड़ाई लम्बी थी. कुछ ही महीनों में उसका शीराज़ा बिखर गया. आन्दोलन व्यवस्था पर बड़े दबाव बना सकते हैं, लेकिन लम्बे समय तक लगातार उन्हें चलाये रख पाना मुश्किल है. हल तो यही है कि अपनी संस्थाओं को सुधारने के लिए लगातार छोटे-छोटे दबाव बनते रहें. यौन शोषण के इन दोनों मामलों में यही हुआ. पीड़ित लड़कियाँ आगे आयीं.
 लड़ाई शुरू हुई. यह एक शुभ संकेत है. लोग अपनी बात कहने लगें, तो उसे सबको सुनना ही पड़ेगा. इसलिए निराशा छोड़िए, कहिए और लड़िए, ताकि भविष्य निराश न हो!
(लोकमत समाचार, 23 नवम्बर 2013)

Saturday, 16 November 2013

काला जादू और भेड़ बनीं सरकारों का तिलिस्म!

पैसा रे पैसा, तेरा रंग कैसा? आये चाहे जहाँ से, लगे न बिलकुल खोटा! एक पुराना गाना था, सत्तर के दशक की फ़िल्म 'शोर' का, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो, लगे उस जैसा. सचमुच पानी का कोई रंग नहीं होता. जिस रंग को पानी में डाल दीजिए, वह उसी रंग का हो जाता है. लेकिन पैसे के कम से कम दो रंग तो होते हैं, यह बात तो पूरी दुनिया जानती है. एक सफ़ेद और दूसरा काला. और आजकल तो बच्चों तक को पता है बन्धु कि काला पैसा कितने तरह का होता है, जैसे टैक्स चोरी का पैसा, अंडरवर्ल्ड और आतंक का पैसा, ब्लैकमेलिंग का पैसा, विदेशी पैसा वग़ैरह-वग़ैरह.

और आजकल काले धन को वापस लाने को लेकर ख़ूब हल्ला मचा है. एक योगी बाबा योग छोड़ कर काले धन की थाह पाने ऐसे आसन पर बैठे कि पुरुष से महिला वेशधारी हो गये और तीन दिन के अनशन में ही चूँ बोल गये! अपनी राजनीतिक पार्टी बनाते-बनाते अब वह मोदी जी के जयकारे लगा रहे हैं. रालेगण सिद्धि से चला एक और उत्साही सदा उपवासी जत्था था. देखते ही देखते वह कुछ इधर बँटा, कुछ उधर बँटा, कुछ कहीं टूटा, कुछ कहीं बिखरा, और आख़िर में 'आप' और 'बाप' बच गया. 'आप' वाले फ़िलहाल दिल्ली में चुनाव लड़ रहे हैं, 'बाप' लापता है! जिन्हें 'बाप' न समझ आया हो, वे गूगल सर्च कर लें!

इन सबको विदेशों से काला धन वापस लाना था. कहते हैं वहाँ के बैंकों में हज़ारों या कौन जाने लाखों भारतीयों का हज़ारों हज़ार करोड़ का काला धन जमा है. उसे वापस लाना है, कैसे आयेगा, किसी को पता नहीं. तेरी-मेरी-इसकी-उसकी हर छाप की सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, लेकिन काले धन के काले जादू से सब सरकारें भेड़ बन जाती हैं! वैसे भी अपने लोकतंत्र की महान परम्परा है, जब आप सरकार बहादुर हो तो बयानबहादुर बनो! बयान दो, देते रहो, देते रहो और जब विपक्ष में हो तो नारों के फुफकारे मारो, मारते रहो! जैसा कि आजकल अपने नमो जी कर रहे हैं. इधर वह इतने फुफकारे मार रहे हैं कि उन्हें स्मृति लोप होने लगा है. वह अपने ही नेताओं के नाम भूलने लग गये! ऐसे ही एक दिन उन्होंने बड़े ज़ोर की हुँकार लगायी कि सरकार काले धन पर श्वेत पत्र क्यों नहीं लाती? कुछ ही घंटों बाद मीडिया ने उन्हें बता दिया कि अभी साल भर पहले ही सरकार काले धन पर श्वेत पत्र ला चुकी है. अब क्या वह हर महीने श्वेत पत्र लाये? वैसे कहते हैं कि झूठ सफ़ेद होता है. श्वेत पत्र सुन कर पता नहीं क्यों यह सफ़ेद झूठ वाला मुहावरा याद आ गया!

बहरहाल, इस कथा का मर्म यह है कि जो जब तक सरकार में नहीं रहता, वह काले धन को वापस लाने के लिए ख़ूब मचलता है, क्योंकि उसे मालूम है कि वह सिर्फ़ हल्ला मचाने का नाटक ही करता है. और सरकार तो कुछ करेगी ही नहीं. अब आप इतने भोले तो नहीं ही होंगे कि आपको बताना पड़े कि क्यों सरकार कुछ करना नहीं चाहती!

वैसे इधर काले धन का मामला ज़रा ठंडा पड़ा था. 'आप' यानी आम आदमी पार्टी को मिलने वाले विदेशी चन्दे का मामला न उठा होता, तो शायद हम यह चर्चा न कर रहे होते. आरोप लगा कि 'आप' को विदेश से बेनामी चन्दे मिल रहे हैं. 'आप' ने कहा कि उसकी वेबसाइट पर हर चन्दे का पूरा ब्यौरा मौजूद है. लेकिन सरकार ने कहा कि वह 'आप' को मिल रहे पैसे की जाँच करायेगी. क्या मज़ाक़ है? 'आप' का मामला तो कुछ लाख रुपयों का ही है, काँग्रेस, बीजेपी और तमाम दूसरी पार्टियों के तो हज़ारों करोड़ के चन्दे का कहीं कोई हिसाब नहीं है, कहाँ से आया, किसने दिया, देशी पैसा है कि विदेशी, किस काम से कमाया काला धन है, कोई ब्यौरा नहीं. और करोड़ों का चन्दा उगाहने वाली ये तमाम पार्टियाँ आरटीआइ का विरोध करती हैं, ताकि किसी को पता न चले कि इन्हें पैसा कहाँ से मिलता है? एक क़ानून और बना दिया है. बीस हज़ार से कम के चन्दे का कोई ब्यौरा रखने की ज़रूरत नहीं! काले को सफ़ेद करने का भला इससे आसान रास्ता क्या हो सकता है? तो जब ये तमाम पार्टियाँ ही बेशर्मी से काले धन की उगाही में जुटी हैं तो ये काले धन को भला क्यों ख़त्म करना चाहेंगी? आप अब भी न समझें और बेवक़ूफ़ बनते रहें तो बेचारी इन पार्टियों का क्या दोष?
(लोकमत समाचार, 16 नवम्बर 2013)

Thursday, 14 November 2013

अन्ना से मोदी तक, हम सब एक हैं!

आप चाहे आप हों, अन्ना हों, वीपी हों, आडवाणी हों, मोदी हों या चाहे भी जो कुछ हों, सबके सब एक ही अनार के लिए बीमार क्यों हुए जाते हैं? नाम बड़े किसिम-किसिम के, लेकिन दर्शन वही खोटे! ऐसा लगता है कि ये जनता ही कोई ऐसी सम्मोहनी सुन्दरी है कि जो एक बार इसके फेर में पड़ता है, बस लट्टू हो जाता है! अब अपने केजरीवाल साहब को ही देखिए. लोकपाल लीला की चकल्लस चखते ही जनता की मोहिनी माया में फँस गये. राजनीति में उतरे. बोले, राजनीति की सफ़ाई करनी है. झाड़ू चाहिए. लगा कि भई, वाक़ई बड़ा दमदार बन्दा है. चुनाव निशान चुना तो झाड़ू. सचमुच यह राजनीति की सफ़ाई करके ही मानेगा. लेकिन क्या पता था कि वह भी उसी गटर में गिर जायेंगे, जहाँ के कीचड़ में लोटने-पोटने को हर कोई ललक रहा है! सो केजरीवाल साहब बरेली जा कर आला हज़रत मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ान साहब के दरवाज़े सजदा कर आये! मौलाना साहब सुन्नी मुसलमानों के बरेलवी पंथ के सबसे बड़े नेता हैं और कांग्रेस, बीएसपी से होते हुए फ़िलहाल समाजवादी पार्टी के साथ हैं. इन पर मुसलमानों को दंगों के लिए उकसाने के संगीन आरोप लग चुके हैं. तसलीमा नसरीन और जार्ज बुश का सिर क़लम कर दिये जाने की पैरवी मौलाना साहब बड़े ज़ोर-शोर से कर चुके हैं. लेकिन केजरीवाल जी को मुसलिम वोटों की चिन्ता तो करनी ही पड़ेगी न!

ये मुए वोटों की भंग ऐसी चढ़ी कि केजरीवाल साहब की याद्दाश्त पर ढक्कन लग गया. कुछ याद न रहा कि तौक़ीर रज़ा साहब क्या-क्या कर चुके हैं. न ही उनके बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, रिसर्चजीवी सिपहसालारों में से किसी की दूरबीन कुछ देख पायी. सच ही कहा है किसी ने प्रेम अन्धा होता है! हमने आज अपनी आँखों से देख लिया कि वोटों का प्रेम बड़ी-बड़ी दूरबीन दृष्टियों को भी अन्धा कर देता है. बड़े-बड़े भलेमानुस, बड़े-बड़े सिद्धाँतवादी सिद्ध जन भी वोटों की रति से ललच कर बरसों से ओढ़े ब्रह्मचर्य की कथरी को बिन सकुचाये-लजाये उतार कर डुबकी लगा लेते हैं!

उधर, बेचारे नमो भाई को मन मार के मुसलमानों से प्रेम जताना पड़ जा रहा है. अपनी सभाओं में टोपियों और बुरक़ों की नुमाईश करनी पड़ रही है. अब यह अलग बात है कि कभी-कभी ज़बान फिसल जाती है और मुँह से 'पिल्ला' निकल पड़ता है! मोदी साहब का यह नया-नया इश्क़ देख कर शिव सेना दुःख से दुबली हुई जा रही है!

कुछ बरस पहले उन्हीं के 'भीष्म पितामह' आडवाणी जी तो अपनी 'हार्डलाइनर' की छवि धोने के चक्कर में जिन्ना को सेक्यूलर बताने का ऐसा पाप कर बैठे कि पूरे राजनीतिक जीवन की सारी कमाई ही गँवा बैठे. गये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास!

थोड़ा और पीछे 1988 में चलते हैं. भ्रष्टाचार का ही मुद्दा लेकर वी. पी. सिंह केन्द्र सरकार से अलग हुए थे. जनमोर्चा बना था. कहा गया कि जनमोर्चा दस साल तक राजनीति में नहीं उतरेगा. बहरहाल, कुछ ही दिन बीते होंगे कि वी. पी. सिंह ने तय किया कि वह इलाहाबाद से उपचुनाव लड़ेंगे. एक तरफ़ भाजपा समेत पूरा संघ परिवार वी. पी. सिंह के साथ लगा था, दूसरी तरफ़ सैयद शहाबुद्दीन की लिखित अपील मुसलमानों के बीच बँटवायी जा रही थी. हो गया न पूरा सेक्यूलर प्रचार! और जब जनमोर्चा के एक और संस्थापक सदस्य आरिफ़ मुहम्मद ख़ाँ वहाँ पहुँचे, तो वी. पी. सिंह के चुनाव मैनेजरों ने उन्हें प्रचार ही नहीं करने दिया. डर था कि शाहबानो मामले में आरिफ़ के स्टैंड के चलते मुसलमान कहीं बिदक न जायें!

चलिए, ये सब तो वोट के बौराये हुए लोग हैं, लेकिन अन्ना जी को क्या हुआ था? अभी कुछ दिन पहले तक जनरल वी. के. सिंह को चिपकाये-चिपकाये घूम रहे थे. देश की तसवीर बदलते-बदलते सिंह साहब ने रातोंरात पाला बदल लिया. अब वह नरेन्द्र मोदी से नैन-मटक्का कर रहे हैं और अन्ना बेचारे हाथ मल रहे हैं! ऐसे ही एक ज़माने में अन्ना जी बाबा रामदेव पर लहालोट हुआ करते थे क्योंकि रामदेव उनके लिए भीड़ जुटवा सकते थे. रामदेव कितने विवादों में घिरे रहे थे, यह किससे छिपा है. रामदेव भी अब मोदी के धुरन्धर ध्वजारोही हैं!

हमने यहाँ उन पार्टियों का नाम जानबूझकर नहीं लिया जिन पर बीजेपी 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का लेबल लगाती है. यहाँ बात सिर्फ़ उनकी है, जिन्होंने मौसम देख कर कोट बदल लिए! काहे का उसूल, काहे की विचारधारा, सब कहने की बातें हैं. इनका एक ही उसूल है, वोट मिले, भीड़ मिले, बाक़ी सब जाय भाड़ में! अपनी-अपनी रंग-बिरंगी टोपियों के नीचे सब एक ही रंग के अवसरवादी हैं. अन्ना से मोदी तक, हम सब एक हैं!
(लोकमत समाचार, 9 नवम्बर 2013)

रोशनी का अँधेरा और सच की चाँदनी!


यह रोशनी के अँधेरे का दौर है! जी हाँ, कभी-कभी रोशनी भी अँधेरा कर देती है. जब आँखें चौंधिया जायें, तो कुछ भी दिखना बन्द हो जाता है! आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है. यही होता है रोशनी का अँधेरा! इस दीवाली अचानक यह महसूस हुआ कि चारों तरफ़ रोशनी की इतनी चकाचौंध है कि चीज़ों की सही शक्लें दिखती ही नहीं, ज़िन्दगी के असली रंग दिखते ही नहीं.
आज तो बड़े-बड़े रोशनी भरे शो रूमों का ज़माना है. कुछ साल पहले तक छोटी-छोटी दुकानें हुआ करती थीं. ग्राहक न हो तो मामूली बल्ब टिमटिमाते रहते थे. उन दिनों लोग एक-एक यूनिट बिजली ख़र्च करने से पहले दस बार सोचते थे! कोई ग्राहक आता तो चीज़ें दिखाते-दिखाते दुकानदार अचानक फ़ोकस लाइटें जला देता था और चीज़ें जगमगा उठती थीं. अकसर ऐसा हुआ कि रोशनी के इस झाँसे में कोई कपड़ा बहुत पसन्द आ गया, ख़रीद लाये, बाद में दिन की रोशनी में देखा तो पता चला कि इसका रंग वैसा नहीं है, जैसा कल दुकान की झकाझक रोशनी में दिखा था. एक-दो बार ऐसे ठगे गये तो आदत बना ली कि दिन के उजाले में ही चीज़ें ख़रीदेंगे ताकि रोशनी के फ़रेब में न फँसें!
आज की पीढ़ी ने शायद कभी यह महसूस न किया हो कि चमचम रोशनी कैसे ठगती है! वैसे भी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया के मकड़जाल से बाहर की असली दुनिया भला कब दिख पाती है? सुपरफ़ास्ट सूचनाओं की रेलमपेल और सोशल नेटवर्किंग के 'एमोटीकाॅन' के भँवर में जब सारा संवाद अटक जाय और व्यक्ति का समूचा संसार एक कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट या मोबाइल फ़ोन में सिमट जाये तो आपकी पहुँच ग्लोबल ज़रूर हो जाती है लेकिन अपना घर, अपनी गली, अपने रिश्ते, अपने लोग, अपनी धूप, अपनी हवा, अपना दिन, अपनी रातें, अपनी सुबह, अपनी शामें ---यह सब एहसासों की छुअन से कहीं बहुत दूर हो जाता है.
जितनी ज़्यादा रोशनी, उतना ही ज़्यादा बड़ा झाँसा और उतना ही बड़ा ख़तरा कि हम चीज़ों के आकार-प्रकार, रंग-रूप न पहचान पायें, न समझ पायें, न महसूस कर पायें. लालटेन दौर के बाद जब शहरों में पहली बार बिजली आयी थी, तो कमरे में 40 वाॅट का बल्ब भी आँखों को चौंधिया देता था. ऐसा लगता था कि इतनी रोशनी का क्या करें! दिया-बाती से 40 वाॅट के बल्ब तक आने के बहुत दिनों बाद तक भी रातों को चाँदनी पूरी शान-ओ-शौकत से नहलाती रही थी, घनघोर गरमी में भी चाँदनी मन को ठंडक दे देती थी, तारों भरा आसमान दिल के तारों को झनझना दिया करता था. आज चाँदनी लापता हो चुकी है और तारे मुश्किल से नज़र आते हैं, बिलकुल इक्का-दुक्का, जैसे अँधेरे के जंगल में रास्ता भटक गये हों.
जब रोशनी कम थी तो उजाला ज़्यादा था. तारे, चाँदनी, परछाईं ये सब आपके साथ चला करते थे. आज दानवी रोशनी ने इन सब को निगल लिया है. दीपावली है, लेकिन दीयों की क़तारें नहीं. आख़िर कौन इतने सारे दीयों को जलाने में वक़्त बरबाद करें और थोड़ी-थोड़ी देर में उनमें तेल या घी भरता रहे. आज एक स्विच आॅन करने से हज़ारों-हज़ार झालरें और लड़ियाँ जगमगा उठती हैं. फिर दीयों के झंझट में कौन पड़े. सही है. लेकिन कभी सोच कर देखा है कि दीयों के साथ जो जतन करना पड़ता था, उससे आत्मीयता जो का रिश्ता जुड़ता था, मंद-मंद हवाओं में उनकी लौ को इतराते-इठलाते देख कर जो एहसास होता था, क्या वही कुछ सुख हज़ारों-हज़ार झालरों से मिलता है?
बात सिर्फ़ दीवाली की रोशनी की नहीं है. जीवन के हर कोने-अतरे में ठसाठस भर आयी चकाचौंध की है. घर, बाज़ार, शॉपिंग माल, साइन-बोर्ड, होर्डिंग---हर जगह राक्षसी रोशनी का सम्मोहक रति-नृत्य! बड़े-बड़े विशाल विज्ञापन, अरबों-करोड़ों का प्रचार, तेल-साबुन बेचते हुए हीरो-हीरोइनों, क्रिकेटरों की फ़ौज, सौन्दर्य के सारे प्रतिमानों को लजा देने वाली कमनीय पैकिंग, रोशनी का एक ऐसा वशीकरण तंत्र कि लोग सुध-बुध खो बैठें! ठीक. लेकिन पैकिंग की परतों के भीतर माल भी उतना ही चोखा निकलता है क्या? अब सोचिए कि रोशनी का अँधेरा हम सबको कैसे ठग रहा है. सूचनाओं का अन्तहीन समंदर चारों तरफ़ पसरा है, चकाचौंध रोशनी में सच की चाँदनी ग़ायब है. क्या हम पल भर रुकेंगे, थमेंगे, जगेंगे, सोचेंगे कि चाँदनी और रोशनी के अँधेरे के बीच हम क्या चुनें?
(लोकमत समाचार, 2 नवम्बर 2013)

जादूगर, जीडीपी और प्याज़ का उड़न छू होना !

अजब देश है अपना. पता नहीं क्या बात है कि प्याज़ बिना गाड़ी चलती नहीं हमारी! सदियों पुराने ज़माने से यह प्राणप्यारे जियादुलारे प्याज़ का कृतज्ञ रहा है. तब जिसके नसीब में कुछ नहीं होता था, उसे प्याज़-रोटी तो नसीब थी! माबदौलत राजा-महाराजा लोग प्याज़ की बदौलत ही चैन की नींद सोया करते थे. चलो ग़रीबों को कुछ मिले न मिले, पेट भरने के लिए प्याज़ और रूखी-सूखी रोटियाँ तो मिल ही जायेंगी! प्रजा ख़ुश रहेगी और राज्य से लेकर राजमहल तक शान्ति रहेगी. बग़ावत का डर नहीं होगा, जब तक ग़रीबों को प्याज़ मिलता रहेगा!
अब लगता है कि समय सचमुच बदल गया है. ग़रीब तो सपने में भी प्याज़ देख पाने का सपना नहीं देख सकता! प्याज़ तो एक मायावी इन्द्रजाल बन चुका है! करोड़ों-अरबों कमाने का जादू! एक बड़ा जादूगर है, जो जादू दिखाता है और प्याज़ देखते ही देखते छू मंतर हो जाता है. सब भौंचक्के! अभी तो चारों तरफ़ प्याज़ का इतना अम्बार लगा था. लाखों टन प्याज़! फिर यह कैसा ग़ज़ब जादू था कि वह आँखों से ओझल हो गया? अब जनाब जादू है तो सब सम्भव है. पहले दालों पर यही जादू चला था, चीनी पर चला था, अब जादूगर का दिल प्याज़ पर आ गया है. जब वह खेल दिखाता है और मंतर मारता है, अक्रा बक्रा बम्बे बो गड़प, तो चीज़ ग़ायब! अब ढूँढते रहो, चाहिए तो जेब ढीली करो! फिर सब बोलते हैं त्राहिमाम, त्राहिमाम! रोते-रोते पखवाड़े बीते, महीने बीते, जादूगर की जेब भर चुकी होती है. वह बोलता है अक्रा बक्रा बम्बे दो...दो...दो, और चीज़ हाज़िर!
बचपन में हमने बहुत जादू देखे, सोचते थे बस इन्द्रजाल सीख लो और चाहे जिसको बकरा बना दो! बड़े हुए तो पता चला कि ये जादू-वादू तो कुछ होता ही नहीं है. सब ट्रिक है बन्धु! अपनी ही आँखों का छलावा! हम तो बड़े हो गये, समझदार हो गये, जादू की पोल-पट्टी जान गये, सो अब उसके झाँसे में नहीं आते. पर बेचारी यूपीए सरकार! अभी कुल नौ साल की ही तो है. बिलकुल बच्चा है जी! सो वह तो जादूगर से बहुत डरती है. पता नहीं कब वह उसे बकरा बना दे और डकार जाये या फिर हमेशा-हमेशा के लिए मक्खी बना कर उड़ा दे! सो पिछले पाँच साल से वह डरी-डरी यह उड़न छू वाला जादू देख रही है. दाल ग़ायब, चीनी ग़ायब, प्याज़ ग़ायब! जादूगर तो दादी अम्मा की कहानियों जैसा बड़ा ख़तरनाक और सरकार एक छोटा-सा बच्चा! भला कहाँ मुक़ाबला है दोनों का. इसलिए जब जादूगर जादू दिखाता है, तो सरकार गिड़गिड़ाने लगती है, हे जादूगर तेरी जेब की प्यास भर गयी हो तो अब हमारी जान बख़्श दे! आख़िर जादूगर का दिल पसीजता है! जी हाँ, उसके पास जेब के साथ-साथ दिल भी है. उसे दोनों का ख़याल रखना पड़ता है. आख़िर ग़ायब हुआ सामान लौट आता है. बच्चो बजाओ ताली!
आज ही एक अख़बार में पढ़ रहा था कि पिछले दस सालों में प्याज़ का उत्पादन 42 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर क़रीब 163 लाख मीट्रिक टन हो गया, यानी क़रीब-क़रीब चार सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. जबकि 2003 में हमारी आबादी 1.05 अरब थी, जो दस साल बाद अब 1.23 अरब है. यानी दस साल में कुल क़रीब 18 प्रतिशत बढ़ोत्तरी. तो बताइये इतना प्याज़ जाता कहाँ है. हर आदमी सब कुछ छोड़ कर सिर्फ़ प्याज़ ही खा रहा है क्या? आबादी सिर्फ़ 18 प्रतिशत बढ़े और उत्पादन 400 प्रतिशत और फिर भी बाज़ार में प्याज़ में न मिल रहा हो! ऐसा अद्भुत चमत्कार हमारे ही देश में हो सकता है.
न हमारे यहाँ कभी दालों का उत्पादन घटा था, न गन्ने का और न प्याज़ का. फिर भी पिछले पाँच सालों में इनका अभूतपूर्व संकट देश में कैसे खड़ा हो गया? किसी के पास कोई जवाब नहीं है! यह भ्रष्टाचार का नवीनतम आविष्कार है. माल छिपाओ, दाम बढ़ाओ और लूटो. पाँच साल से यह सिलसिला चल रहा है. हर बार सरकार बस टुकुर-टुकुर देखती रहती है. राजाओं-महाराजाओं के दौर में न जीडीपी थी, न विकास दर की चिड़िया, लोग अकाल और महामारी से भले मरते हों, लेकिन प्याज़ सोने जैसा क़ीमती शायद कभी नहीं था. वरना बेचारे ग़रीब प्याज़- रोटी कैसे खाते? कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही राजा होती है, होती होगी. लेकिन एक सरकार और कुछ जादूगर भी होते हैं न!
(लोकमत समाचार, 26 अक्तूबर 2013)

Wednesday, 13 November 2013

काजल की कोठरी, चतुर सुजान और 'बेदाग़' निकलने का मंतर

पता नहीं जिन्न सचमुच में होते हैं या नहीं. हों या न हों, लेकिन कहते हैं कि जिन्न कभी मरते नहीं. बोतल में बन्द करके समंदर में फेंक दो या कुछ भी कर दो, कभी न कभी वे फिर निकल आते हैं. राडिया टेपों का जिन्न भी एक बार फिर निकल पड़ा है. जब पहली बार निकला था, तब बड़ा गुल-गपाड़ा मचा था. राजनीति, उद्योग, लाॅबीइंग के  भ्रष्ट त्रिकोण की एक छोटी-सी झलक तब दिखी थी. सत्ता के गलियारों में कैसे काम बनवाया-बिगड़वाया जाता है, कैसे कहाँ किसकी गोटियाँ फ़िट करायी जाती हैं, अख़बारों और मीडिया में क्या छपे और दिखे, सरकार बन रही तो कौन किस विभाग का मंत्री क्यों बने, और जाने क्या-क्या! देश ने पहली बार देखा कि ये राजकाज सचमुच चलता कैसे है. यह सब देख लोगों की आँखें खुली की खुली रह गयीं. बड़े-बड़े नाम सामने आये, मीडिया के भी नाम! फिर सब कुछ लीप-पोत बराबर हो गया. राजकाज फिर बदस्तूर चल पड़ा. सबने सबको बड़ी इज़्ज़त से बचा लिया!
लेकिन बोतल से जिन्न एक बार फिर बाहर निकला है. पूरा नहीं, बहुत थोड़ा-सा! सुप्रीम कोर्ट ने राडिया टेपों के पहाड़ में से कुछ मुद्दे और मामले ढूँढ निकाले हैं. अब उनकी जाँच होगी! कोर्ट को साफ़-साफ़ लगता है कि राडिया टेपों का मामला सिर्फ़ सिर्फ़ 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन तक ही नहीं था. बल्कि यह राजनेताओं, सरकारी अफ़सरों और उद्योगपतियों के बीच बहुत गहरी गिरोहबन्दी का भंडाफोड़ है, जिससे पता चलता है कि निजी फ़ायदों के लिए दुष्चक्र कैसे गढ़े जाते हैं, भ्रष्टाचार के हमाम में सब एक साथ कैसे नहाते हैं, ऊँची-ऊँची नियुक्तियाँ कैसे होती हैं, काम निकलवाने के लिए करोड़ों की थैलियाँ कैसे इधर से उधर होती हैं, और कुछ मामलों में ऊँची अदालतों के फ़ैसलों को प्रभावित करने के लिए क्या खेल खेले गये.
कोर्ट ने फ़िलहाल सभी मामलों को अभी गुप्त रखा है, क्योंकि सब बड़े-बड़े नाम, बड़ी-बड़ी इज़्ज़त वाले लोग हैं. पहले जाँच हो और पता चले कि इन मामलों में कुछ सबूत मिल पायेंगे या नहीं, कोई क़ानूनी कार्रवाई हो सकती है या नहीं. सीबीआई को कुछ ठोस सबूत मिलेंगे, तो मामला कुछ आगे बढ़ेगा, वरना टाँय-टाँय फिस्स! अब ये सब जानते हैं कि सीबीआई को सबूत कब मिलते हैं और कब नहीं 'मिल पाते' हैं और कब 'मिल कर भी नहीं मिल पाते' हैं! जब रही भावना जैसी, केस की मूरत सीबीआई देखी तिन तैसी! कभी राजनीति की ज़रूरतें, कभी कोर्ट का डंडा, कभी सीबीआई की अपनी मनमर्ज़ी, इनमें से जब जैसी लगाम हो, केस का घोड़ा वैसे ही चलेगा. अब दूर क्यों जाते हैं. अपराध के दो मामले देखिए. आरुषि तलवार हत्याकांड और निठारी में बच्चों की हत्या, यौन शोषण और मानव माँस भक्षण के मामले. कोई बहुत बड़े-बड़े 'पाॅवर' वाले लोगों का मामले नहीं थे ये. लेकिन जाँच कैसे चली, जाँच ने कब-कब कितनी कितनी पलटियाँ खायीं, सबके सामने है. कभी सबूत नहीं मिले, कभी मिल गये! है न कमाल की बात!
तो फिर इन टेपों के जिन्न के दोबारा निकलने से क्या होगा? कह नहीं सकते! और अभी तो बहत्तर हज़ार टेपों में से सिर्फ़ अठारह हज़ार को सुना जा सका है. बाक़ी कहाँ-कहाँ क्या दबा पड़ा है, कौन जानता है? जब पहली बार टेप मीडिया में लीक हो गये थे, तब बहुत-सी बातचीत छप गयी थी. क़ानूनी कोई मामला बन पाया हो या न बन पाया हो, कई मामलों में नैतिकता का संकट तो खड़ा हो ही गया था. अब यह अलग बात है कि आज के ज़माने में चतुर सुजानों ने काजल की कोठरी से 'बेदाग़' निकल आने का मंतर ढूँढ लिया है. सो किसी का बाल भी बाँका नहीं हुआ.
अपन बरसों से देख रहे हैं. भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले आये और गये. काजल की कोठरियों से लेकर काजल के बड़े-बड़े भूत बंगले खड़े हुए. जाँच बैठी, अदालतें लगीं. साबित कुछ भी नहीं हुआ. जनता बेचारी के बस में बस टुकुर-टुकुर देखना ही बचा है. वह इन्तज़ार कर रही है कि एक दिन लोकपाल आयेगा और सब ठीक हो जायेगा. अन्ना के जन लोकपाल का दम तो निकल चुका है. अब जो परकटा लोकपाल आयेगा (अगर वह वाक़ई आ सका तो), वह फड़फड़ा भर भी ले तो तसल्ली करके चुप बैठियेगा. राजकाज तो जैसे चलता है, चलता रहेगा!
(लोकमत समाचार, 19 अक्तूबर 2013)

सचिन को कभी ऐसा 'भगवान' बनने की ज़रूरत नहीं थी

भगवानों के बिना भी क्या जीना? ज़िन्दगी की हज़ार झंझटें, हज़ारों हसरतें, लाखों मन्नतें, और मन में बसीं चमत्कारों की जन्नतें ही जन्नतें! इतना काम और एक भगवान! कैसे सम्भव है भला? सो, हर काम के लिए हमारे पास अलग-अलग भगवान हैं. मन्दिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारों वाले भगवान अलग. पीर-फ़क़ीर, स्वामी, सन्त, बाबा टाइप अलग. फिर सिनेमा के, क्रिकेट के, राजनीति के, जाति के और भी न जाने किस-किस चीज़ के भगवान अलग!
अब सचिन तेंडुलकर को ही लीजिए. मीडिया ने देखते ही देखते उन्हें क्रिकेटर से भगवान बना दिया, क्रिकेट का भगवान! और यह 'भगवानी' मिले उन्हें अभी दो-तीन साल ही हुए होंगे कि बेचारे को क्रिकेट से अपने संन्यास की घोषणा करने पर मजबूर होने पड़ा. और यह घोषणा भी कैसी? चुपचाप! अचानक और अकेले! क्या आपको नहीं लगता कि जिसे अापने क्रिकेट का भगवान बना दिया था, वह इन दिनों किस पीड़ा को भुगत रहा होगा कि उसने इस तरह अपने संन्यास का एलान किया.तीन लोगों को टेलीफ़ोन और बीसीसीआई को चिट्ठी लिखकर! न धूम, न धाम, न गाजा, न बाजा; एक चिट्ठी छोड़ चला गया क्रिकेट का राजा!
बड़ी अजीब बात है. कुछ साल पहले कुछ लोगों ने सचिन को 'एंडुलकर' घोषित कर दिया. 'एंडुलकर' यानी जिसका अन्त हो चुका है. कोई और होता तो शायद ही ऐसा सुन कर सदमे से उबर पाता. लेकिन कमाल की चीज़ हैं सचिन. वह खेले, ख़ूब खेले और ऐसा खेले कि 'एंडुलकर' लिखनेवालों को याद ही नहीं रहा कि उन्होंने कभी तेंडुलकर को डस्टबिन में फेंक दिया था. वे सब झूम-झूम कर 'भगवान' सचिन की आरती गाने लगे! लेकिन कुछ ही दिन बाद उनकी याद्दाश्त फिर से धोखा दे गयी. फिर बतकहियाँ उठने लगीं, फिर कुलबुलाने लगा खटराग 'इति प्रस्थान कालम्!'
सचिन के साथ जो हुआ, उससे भी बुरा पहले गावसकर के साथ हो चुका है. जिन दिनों भारत के पास क्रिकेट में बेदी, प्रसन्ना, चन्द्रशेखर की स्पिन तिकड़ी के अलावा और कुछ ख़ास नहीं था, तब एक नाटे क़द के महानायक ने करिश्माई सफलता के कई आकाश रचे थे. जब यहाँ लोग डाॅन ब्रेडमैन और गैरी सोबर्स की तरफ़ चौंधियाई आँखों से तका करते थे, जब सारी दुनिया तूफ़ानी तेज़ गेंदबाज़ों से थरथराया करती थी, उन दिनों गावसकर ने अपने बल्ले का विश्वविजयी साम्राज्य स्थापित किया था! लेकिन गावसकर को हम वह नहीं दे पाये, जो उन्हें मिलना चाहिए था. गावसकर तो ख़ैर बहुत विवादों में रहे, कप्तानी को लेकर, टीम में जगह को लेकर, तमाम तरह के वितंडों में वह फँसते-उतराते रहे. कई बार उन पर आरोप लगे कि वह केवल अपने लिए खेलते हैं, देश के लिए नहीं. सचिन और किसी विवादों में तो नहीं घिरे, हालाँकि संयोग यह कि उनके बारे में भी यह ख़ूब कहा गया कि वह 'बेकार' हो गये मैचों में ही जलवा दिखा पाये और संकट के समय अकसर टीम को उनकी मौजूदगी का फ़ायदा नहीं हुआ. लेकिन आँकड़े इन आरोपों को कभी साबित नहीं कर पाये.
पहले गावसकर, अब सचिन! दो महानायक, एक कहानी, एक हश्र! सचिन जैसी अद्भुत प्रतिभा करोड़ों-अरबों में कोई एक होती है. उन्हें भगवान बनाने की और फिर ऐसी बदरंग विदाई की ज़रूरत नहीं थी. वह भगवान नहीं, महानायक हैं. और एक महानायक कभी मरता नहीं, कभी लोगों की यादों से विदा नहीं होता.
मेहरबानी करके 'भगवानों' के कारोबार से सचिन को मुक्त ही रखिए. यह ठीक है कि चमत्कारों को नमस्कार वाले हम घोंघा बसन्तों को अपने-अपने हज़ारों भगवान बनाने में बड़ा मज़ा आता है. जो भी कोई चमत्कार दिखा दे या चमत्कार दिखाने का वादा या छलावा कर सकता हो, हम उसे तुरन्त 'भगवान' बना देते हैं. और अगर ऐसे किसी 'भगवान' ने कोई सन्तई, बाबाई या फ़क़ीरी चोला धारण कर रखा हो तो आँखें बन्द कर उसकी अन्धभक्ति में लीन रहते हैं. चाहे उसके कुकर्मों के कितने ही सबूत सामने न आ जायं. राजनीति में भी ऐसे ही तरह-तरह के 'भगवान' हैं. भक्तिविह्वल जनता ख़ुद को ठगाती रहती है और सच देख कर भी नहीं देखना चाहती. वह आँखें मूँदे 'भक्ति' में लीन रहती है, बारम्बार ठगे जाने के लिए समर्पित! सचिन को कभी ऐसा 'भगवान' बनने की ज़रूरत नहीं थी. करबद्ध प्रार्थना है कि मान सकें तो उसे महानायक मानें, कुछ और नहीं.
(लोकमत समाचार, 12 अक्तूबर 2013)


दाग़ या बेदाग़, राजनीति ऐसे मौक़े बार-बार नहीं देती!

दाग़ है तो है. डिटर्जेंट के विज्ञापन की तरह अब तक राजनीति में भी दाग़ अच्छे ही हुआ करते थे. अच्छे न भी हों तो भी दाग़ देखे नहीं जाते थे. लेकिन जनाब, अब वह ज़माना बीत गया. दाग़ हैं तो रहेंगे, कोई अध्यादेश, किसी क़ानून का डिटर्जेंट अब दाग़ धोने नहीं आयेगा. पहली बार ऐसा हुआ कि समूची राजनीतिक बाजीगरी हार गयी. देश के लोकतंत्र में पहली बार ऐसा हुआ कि नेताओं की मर्ज़ी हार गयी और जनता की इच्छा जीत गयी! हालाँकि अपने यहाँ की जनता भी बड़ी ढपोरशंखी है. दूसरे के दाग़ी तो उसे बहुत बड़े दाग़ी दिखते हैं, लेकिन जात-बिरादरी अपनी हो तो दाग़ी नहीं, वह माथे का सिरमौर होता है, अपनी जाति का गौरव होता है!
इसीलिए अब तक दाग़ियों की चाँदी कट रही थी. जनता 'अपनेवाले' गौरव-पुत्रों को चुन-चुन कर भेजती जा रही थी. हर चुनाव के बाद कुछ बाहुबली, कुछ दाग़ी, कुछ महादाग़ी, कुछ सुपर दाग़ी और बढ़ जाते. संसद और विधानसभाओं में एक से एक नाम वाले बदनाम दाग़ी बेचारे शरीफ़ों के लिए क़ायदे-क़ानून बना रहे थे और देश का क़र्ज़ उतार रहे थे!
जनता जानती है और पार्टियाँ भी कि जो दाग़ी है, वह जीतेगा. आमतौर पर आसानी से जीतेगा. इसीलिए हर पार्टी के शो केस में एक से बढ़ कर एक दाग़ी सजे हुए हैं. पार्टी बड़ी हो, छोटी हो; बाँये हो, दाँये हो या बीच में हो; चाल, चरित्र, चेहरे वाली हो या कोई भी हो, इस मामले में सबकी सब ग़ज़ब की हमजोली हैं. सबके पास हर वेरायटी के दाग़ी हैं. अलग-अलग कौशल, अलग-अलग प्रतिभाओं वाले दाग़ी. वोटबल, जातिबल, बाहुबल और धनबल, राजनीति में इन सारे बलों की ज़रूरत पड़ती रहती है! इसीलिए आज हमारे सांसदों और विधायकों में से क़रीब 30 फ़ीसदी दाग़ी हैं.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जब दाग़ियों को लेकर टंटा खड़ा किया, तो देखा नहीं कि कैसे सारी पार्टियाँ एक सुर में बोलने लगीं. सर्वदलीय बैठकें हुईं, क़ानून बदलने की तैयारियाँ शुरू हुईं. लगा कि शायद एक बार फिर शाहबानो वाली कहानी तो नहीं दोहरायी जायेगी. बिल बना, पेश हुआ और राज्यसभा में 'सर्वसम्मति' से पास भी हो गया. आगे की कहानी सबको मालूम है कि बिल कैसे और कहाँ लटका और लालू यादव को बचाने के लिए कैसे आनन-फ़ानन में अध्यादेश लाने की तैयारी की गयी. भला हो राहुल गाँधी का कि अब यह सब अतीत बन चुका है. दाग़ियों की सदस्यता बचाये रखने की मुहिम की चिंदी-चिंदी राहुल के एक हथौड़े से उड़ गयी.
अब यह अलग बहस का विषय है कि राहुल ने जिस तरीक़े से अध्यादेश का मखौल उड़ाया, वह कितना सही था? उससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बड़ी ठेस पहुँची. यूपीए के कई घटक दलों को भी यह सब नागवार गुज़रा. बात सही है. राहुल दूसरे तरीक़ों से भी अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा सकते थे. तब भी शायद अध्यादेश वापस ले लिया जाता और कोई अप्रिय स्थिति न बनती. लेकिन तब शायद काँग्रेस को अपने सहयोगी दलों, मीडिया और जनता को यह समझा पाना मुश्किल होता कि अध्यादेश क्यों वापस लिया गया. क़यास लगते कि राष्ट्रपति भवन अध्यादेश लौटानेवाला था (और शायद यह क़यास ग़लत नहीं होता), इसलिए किरकिरी से बचने के लिए सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया. यानी सरकार अध्यादेश वापस भी लेती, और सरकार और काँग्रेस को बदनामी के सिवा कुछ हाथ न लगता. कोई राजनीतिक फ़ायदा नहीं पहुँचता.
अब राहुल गाँधी ने जो किया, वह भावावेश में किया, बचकानेपन में किया, बिना सोचे-समझे किया या किसी सुविचारित रणनीति के तहत किया, पता नहीं. उससे जो नुक़सान होना था, वह तो हुआ, लेकिन राहुल कम से कम यह सन्देश देने में सफल रहे कि वह राजनीति की गन्दगी बर्दाश्त नहीं करना चाहते और इसकी सफ़ाई के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं. अब अगले विधानसभा चुनावों में उनकी पहली परीक्षा होगी कि वह दाग़ियों को टिकट देते हैं या नहीं. अगर किसी एक पार्टी से भी दाग़ियों के सफ़ाये की शुरुआत हो जाय, तो यह भारतीय राजनीति के लिए बड़ी पहल होगी और राहुल इसका श्रेय ले सकते हैं. राजनीति किसी को ऐसे मौक़े बार-बार नहीं देती!
(लोकमत समाचार, 6 अक्तूबर  2013)















Tuesday, 12 November 2013

एक मुँह की कूटनीति से हम छल-कबड्डी नहीं जीत सकते

आप बात करते हैं. वह भी बात करते हैं. हमले होते हैं. बात अटकती है. वह कहते हैं कि बात करना तो ज़रूरी है. फिर बात होती है. फिर हमले होते हैं. आप ग़ुस्सा जताते हैं. फिर बात होती है. फिर कुछ सिर कटते हैं. कुछ ताबूत घर आते हैं. आप फिर कहते हैं, बात होगी, होती रहेगी. फिर मुलाक़ात होती है, फिर हाथ मिलते हैं, फिर मुस्कराती बत्तीसियाँ सब जगह छपती हैं, फिर अमन के मुहावरे बाँटे जाते हैं. फिर हमला, फिर कुछ शहीद, फिर कुछ ताबूत, फिर शहीदों को सलाम, फिर बात, फिर हमला, फिर बात, फिर हमला, फिर बात....

पता नहीं बातें करते-करते आपके मुँह अब तक थके या नहीं, लेकिन बातों को सुनते-सुनते देश के कान ज़रूर पक चुके हैं. बातें हुईं, लेकिन बातों के पेट से निकले सिर्फ़ हमले, सिर्फ़ ताबूत. कभी सीमा पर हमले, कभी आतंकवादियों के हमले. अगर बातें न करते तो क्या होता? यही होता न कि कुछ हमले होते. तो फ़र्क़ क्या पड़ा? बात करो तो हमला, न बात करो तो भी हमला!

बरसों से देख रहे हैं यह सब. अपनी मूढ़मति को तो यह कूटनीति समझ में आती नहीं. जब बातों से कोई तेल न निकलना हो, तो उसका कोल्हू क्या पेरना? क्या मजबूरी है कि हम पाकिस्तान से बातें करते रहें और लातें खाते रहें? या तो कोई यह बताये कि बातों से अब तक हमें क्या फ़ायदा हुआ? बातों से अगर किसी को फ़ायदा होता है तो पाकिस्तान को होता है. उसके दो मुँह हैं. एक मुँह है सरकारवाला, दूसरा मुँह है सेना और आइएसआइ के राक्षस का. सरकारवाला मुँह हमें बातचीत का चुग्गा डालता रहता है, आतंकवाद की निन्दा करता है, दावे करता रहता है कि पाकिस्तान ख़ुद आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है, दुनिया को बताता रहता है कि पाकिस्तान तो शान्ति चाहता है और पूरी ताक़त से आतंकवाद से लड़ रहा है. उधर, जो राक्षसी मुख है, वह साज़िशें रचता रहता है, नक़ली नोट छापता रहता है, आतंकवाद की फ़ैक्ट्रियों में भट्टियाँ गरमाये रखता है, कभी उसकी सेना, कभी उसके आतंकवादी टट्टू धावे बोलते रहते हैं. नतीजा! एक मुँह हिंसा, तनाव और आतंकवाद के ज़रिये कश्मीर के मुद्दे को सुलगाये और भड़काये रखता है, दूसरा मुँह कहता रहता है कि कश्मीर मसले का हल आपसी बातचीत से निकलेगा, इसलिए आइए हम अमन-अमन खेलें!

तो पाकिस्तान के लिए तो बात करना बड़े फ़ायदे का सौदा है. सारी साज़िशें वह रचता है, और उसका 'शरीफ़' प्रधानमंत्री बातों की छल-कबड्डी खेल-खेल कर अपनी 'शराफ़त' के प्वाइंट बटोरता रहता है. आज नवाज़ शरीफ़ हैं, उसके पहले ज़रदारी और गिलानी थे, उसके पहले करगिल की छुरी वाले परवेज़ मुशर्रफ़ थे जो भारत आये तो बोले कि इस बार 'नया दिल' लाया हूँ. उसके पहले 'पूरब की बेटी' बेनज़ीर भुट्टो थीं. लेकिन बदला क्या? सामने चेहरा कोई भी हो, कौन जाने इनमें से किसके इरादे नेक थे और कौन दिखावा कर रहा था, सारी चाशनियों के नीचे से हमेशा ज़हर ही तो निकला! हम बार-बार इस 'हनी ट्रैप' में क्यों फँस जाते हैं?

हम एक मुँह की कूटनीति से 'छल-कबड्डी' में पाकिस्तान से कभी जीत नहीं सकते. हम बात करके भी फँसते हैं और बात नहीं करेंगे तो भी फँसेंगे! बात नहीं करेंगे, तो दुनिया की नज़रों में पाकिस्तान हमें ही खलनायक, हमें ही मुजरिम साबित कर देगा. इसलिए यह सही है कि हमें पाकिस्तान से लगातार बातें करते रहना पड़ेगा. लेकिन हमारे पास सिर्फ़ एक मुँह है, जो बात करता है. सिर्फ़ बातों वाले मुँह से काम नहीं चलेगा और हम ऐसे ही मुँह की खाते रहेंगे! कुछ नये मुँह लाइए. अलग-अलग काम वाले मुँह. और फिर हो जैसा मुँह, वैसी बात! बहुत ज़माने पहले अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना कह गये हैं: "खीरा सिर से काटिये, मलियत नमक लगाय, रहिमन कड़ुवै मुखन को चहियत इहै सजाय." यानी खीरे की कड़वाहट दूर करने के लिए उसे सिर से काट कर नमक लगा कर मलते हैं, इसलिए जो कड़वाहट फैलाते हैं, उनका यही इलाज है. आज ज़रूर खीरे कड़वे नहीं आते और उन पर नमक लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, लेकिन हमारी कूटनीति को रहीम से कुछ सीखना चाहिए.
(लोकमत समाचार, 28 सितम्बर, 2013)

यह राजनीति नहीं, राखनीति है जो सब राख कर देगी

दंगा आया और चला गया. एक बार फिर हमें नंगा कर गया. लेकिन इस बार जैसा दंगा आज से पहले कभी नहीं देखा. पहली बार इतने मुखौटे उतरे हुए देखे, पहली बार देखे सारे चेहरे कीचड़ सने हुए. पार्टी, झंडा, टोपी, निशान तो बस दिखाने के दाँत रहे, उनके खानेवाले दाँतों ने दंगे की भरपेट दावत उड़ायी. मुज़फ़्फ़रनगर ने सचमुच सारी राजनीतिक पार्टियों के कपड़े उतार दिये. जो चेहरे इतिहास में दंगों के लिए बदनाम रहे हैं, उनकी तो छोड़िये. वह कब आग भड़काने का कोई मौक़ा छोड़ते हैं! लेकिन ओढ़े गये 'सेकुलर' लबादों के नीचे छिपे साम्प्रदायिक भेड़ियों की डरावनी शक्लें पहली बार इस तरह बेनक़ाब हुईं!

क्यों, आख़िर ऐसा क्यों हुआ कि  मुज़फ़्फरनगर में हर राजनीतिक दल के नेता अपनी-अपनी पार्टी नहीं, बल्कि अपने-अपने सम्प्रदायों के नाम पर बँट गये? बीजेपी और समाजवादी पार्टी तो ख़ैर वैसे ही दंगों की साज़िश में गहरे तक डूबी मानी जा रही हैं, लेकिन बीएसपी, काँग्रेस और दूसरी पार्टियों के नेता भी क्यों भड़काऊ कारोबार में शामिल हो गये? और तो और, उस इलाक़े में कभी हिन्दू-मुसलिम एकता का अलख जगानेवाले किसान नेता चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे नरेश टिकैत को क्या हो गया कि वे अपने मरहूम पिता की विरासत को सहेजे नहीं रख पाये? आख़िर ऐसा क्या था कि आज़ादी के बाद पहली बार दंगों के अजगर ने गाँवों को अपनी चपेट में ले लिया, वह भी एक-दो नहीं, 94 गाँवों को?

इसीलिए इस दंगे के संकेत बेहद ख़तरनाक हैं. मुज़फ़्फ़रनगर बैरोमीटर है. उसने बता दिया कि देश के राजनीतिक-सामाजिक वायुमंडलीय दबाव की क्या स्थिति है. बरसों से चल रहे राजनीति के बेशर्म तमाशों ने देश के पर्यावरण में जो ज़हर लगातार घोला है, वह बढ़ते-बढ़ते अब यहाँ तक पहुँच गया है कि शहर, गाँव, गली, चौबारे सब पर उसका असर दिख रहा है.

एक ओर हिन्दू राष्ट्र की भगवा राजनीति, दूसरी ओर सेकुलर समाज बनाने का संघर्ष. आज़ादी के बाद देश की यात्रा यहाँ से शुरू हुई थी. दो धाराएँ साफ़ थीं, हिन्दुत्व की और सेकुलरिज़्म की. हिन्दुत्व का अपना वोट बैंक था, बहुत छोटा. लेकिन वह धीरे-धीरे बढ़ता गया. क्यों? इसलिए कि हमने सेकुलरवाद को भी वोट बैंक से नत्थी कर दिया. सेकुलरवाद जीवनशैली होनी चाहिए थी, उसे पारदर्शी और ईमानदार होना चाहिए था, लेकिन वह बन गया वोट बैंक की राजनीति का अवसरवादी हथियार. सारी समस्या यही है. सारा ज़हर इसीलिए है.

क्या विडम्बना है? सेकुलर पार्टियाँ मुज़फ़्फरनगर में ख़ुद अपने नेताओं को 'सेकुलर' क्यों नहीं रख पायीं? इसलिए कि सच यह है कि सेकुलरवाद में उनकी ख़ुद की कोई आस्था नहीं है. और उन्होंने वोटों की फ़सलें काटने के लिए सेकुलरवाद का जो राजनीतिक फ़ार्मूला समय-समय पर पेश किया, उसने एक अलग क़िस्म की साम्प्रदायिकता को पैदा किया, पाला-पोसा और बढ़ाया. जो नेता कल तक साम्प्रदायिक थे, वे पार्टी बदलते ही रातोंरात 'सेकुलर' हो जाते हैं! कल्याण सिंह समाजवादी पार्टी में आते हैं तो बाबरी मसजिद गिरा कर भी सेकुलर और वापस बीजेपी में पहुँचते हैं तो फिर से मसजिद ध्वंस पर 'गर्वित' हो जाते हैं. आज़म खाँ जैसे लोग अगर 'सेकुलर' माने जायें तो 'साम्प्रदायिक' किसे कहेंगे भाई? हर 'सेकुलर' पार्टी में ऐसे सैंकड़ों नाम हैं, कहाँ तक गिनायें.

तमाम 'सेकुलर' पार्टियों के सैंकड़ों ऐसे हथकंडे रहे, जिनसे उलटे उन्हें ही मदद मिली जो सेकुलरवाद के शत्रु थे. कौन जानता है कि 1985 में शाहबानो मसले पर तब के काँग्रेसी प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अगर राजनीतिक जोखिम उठाने का साहस दिखाया होता तो आज का भारत कैसा होता? सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को संसद ने क़ानून बना कर बेअसर कर दिया, मुसलमान इससे ख़ुश हो गये, हिन्दुओं में क्षोभ फैलना स्वाभाविक था. उन्हें बहलाने के लिए राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद का ताला खुलवा दिया गया, बाद में कांग्रेस के सहयोग से मन्दिर का शिलान्यास भी हो गया! यह था सेकुलरवाद का एक नमूना! मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों को बहलाया गया, तो हुए न पूरी तरह सेकुलर!

बस पेंच यही है. इस सेकुलरवाद ने दोनों ओर की साम्प्रदायिकताओं के मुँह ख़ून लगा दिया. यही सेकुलरवाद की त्रासदी है. आज हर तरफ़ यही खेल है. यह राजनीति नहीं, राखनीति है, जो न रुकी तो एक दिन सब कुछ राख कर देगी. जनता को यह समझना चाहिए!
(लोकमत समाचार, 21 सितम्बर 2013)