Thursday, 14 November 2013

रोशनी का अँधेरा और सच की चाँदनी!


यह रोशनी के अँधेरे का दौर है! जी हाँ, कभी-कभी रोशनी भी अँधेरा कर देती है. जब आँखें चौंधिया जायें, तो कुछ भी दिखना बन्द हो जाता है! आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है. यही होता है रोशनी का अँधेरा! इस दीवाली अचानक यह महसूस हुआ कि चारों तरफ़ रोशनी की इतनी चकाचौंध है कि चीज़ों की सही शक्लें दिखती ही नहीं, ज़िन्दगी के असली रंग दिखते ही नहीं.
आज तो बड़े-बड़े रोशनी भरे शो रूमों का ज़माना है. कुछ साल पहले तक छोटी-छोटी दुकानें हुआ करती थीं. ग्राहक न हो तो मामूली बल्ब टिमटिमाते रहते थे. उन दिनों लोग एक-एक यूनिट बिजली ख़र्च करने से पहले दस बार सोचते थे! कोई ग्राहक आता तो चीज़ें दिखाते-दिखाते दुकानदार अचानक फ़ोकस लाइटें जला देता था और चीज़ें जगमगा उठती थीं. अकसर ऐसा हुआ कि रोशनी के इस झाँसे में कोई कपड़ा बहुत पसन्द आ गया, ख़रीद लाये, बाद में दिन की रोशनी में देखा तो पता चला कि इसका रंग वैसा नहीं है, जैसा कल दुकान की झकाझक रोशनी में दिखा था. एक-दो बार ऐसे ठगे गये तो आदत बना ली कि दिन के उजाले में ही चीज़ें ख़रीदेंगे ताकि रोशनी के फ़रेब में न फँसें!
आज की पीढ़ी ने शायद कभी यह महसूस न किया हो कि चमचम रोशनी कैसे ठगती है! वैसे भी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया के मकड़जाल से बाहर की असली दुनिया भला कब दिख पाती है? सुपरफ़ास्ट सूचनाओं की रेलमपेल और सोशल नेटवर्किंग के 'एमोटीकाॅन' के भँवर में जब सारा संवाद अटक जाय और व्यक्ति का समूचा संसार एक कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट या मोबाइल फ़ोन में सिमट जाये तो आपकी पहुँच ग्लोबल ज़रूर हो जाती है लेकिन अपना घर, अपनी गली, अपने रिश्ते, अपने लोग, अपनी धूप, अपनी हवा, अपना दिन, अपनी रातें, अपनी सुबह, अपनी शामें ---यह सब एहसासों की छुअन से कहीं बहुत दूर हो जाता है.
जितनी ज़्यादा रोशनी, उतना ही ज़्यादा बड़ा झाँसा और उतना ही बड़ा ख़तरा कि हम चीज़ों के आकार-प्रकार, रंग-रूप न पहचान पायें, न समझ पायें, न महसूस कर पायें. लालटेन दौर के बाद जब शहरों में पहली बार बिजली आयी थी, तो कमरे में 40 वाॅट का बल्ब भी आँखों को चौंधिया देता था. ऐसा लगता था कि इतनी रोशनी का क्या करें! दिया-बाती से 40 वाॅट के बल्ब तक आने के बहुत दिनों बाद तक भी रातों को चाँदनी पूरी शान-ओ-शौकत से नहलाती रही थी, घनघोर गरमी में भी चाँदनी मन को ठंडक दे देती थी, तारों भरा आसमान दिल के तारों को झनझना दिया करता था. आज चाँदनी लापता हो चुकी है और तारे मुश्किल से नज़र आते हैं, बिलकुल इक्का-दुक्का, जैसे अँधेरे के जंगल में रास्ता भटक गये हों.
जब रोशनी कम थी तो उजाला ज़्यादा था. तारे, चाँदनी, परछाईं ये सब आपके साथ चला करते थे. आज दानवी रोशनी ने इन सब को निगल लिया है. दीपावली है, लेकिन दीयों की क़तारें नहीं. आख़िर कौन इतने सारे दीयों को जलाने में वक़्त बरबाद करें और थोड़ी-थोड़ी देर में उनमें तेल या घी भरता रहे. आज एक स्विच आॅन करने से हज़ारों-हज़ार झालरें और लड़ियाँ जगमगा उठती हैं. फिर दीयों के झंझट में कौन पड़े. सही है. लेकिन कभी सोच कर देखा है कि दीयों के साथ जो जतन करना पड़ता था, उससे आत्मीयता जो का रिश्ता जुड़ता था, मंद-मंद हवाओं में उनकी लौ को इतराते-इठलाते देख कर जो एहसास होता था, क्या वही कुछ सुख हज़ारों-हज़ार झालरों से मिलता है?
बात सिर्फ़ दीवाली की रोशनी की नहीं है. जीवन के हर कोने-अतरे में ठसाठस भर आयी चकाचौंध की है. घर, बाज़ार, शॉपिंग माल, साइन-बोर्ड, होर्डिंग---हर जगह राक्षसी रोशनी का सम्मोहक रति-नृत्य! बड़े-बड़े विशाल विज्ञापन, अरबों-करोड़ों का प्रचार, तेल-साबुन बेचते हुए हीरो-हीरोइनों, क्रिकेटरों की फ़ौज, सौन्दर्य के सारे प्रतिमानों को लजा देने वाली कमनीय पैकिंग, रोशनी का एक ऐसा वशीकरण तंत्र कि लोग सुध-बुध खो बैठें! ठीक. लेकिन पैकिंग की परतों के भीतर माल भी उतना ही चोखा निकलता है क्या? अब सोचिए कि रोशनी का अँधेरा हम सबको कैसे ठग रहा है. सूचनाओं का अन्तहीन समंदर चारों तरफ़ पसरा है, चकाचौंध रोशनी में सच की चाँदनी ग़ायब है. क्या हम पल भर रुकेंगे, थमेंगे, जगेंगे, सोचेंगे कि चाँदनी और रोशनी के अँधेरे के बीच हम क्या चुनें?
(लोकमत समाचार, 2 नवम्बर 2013)

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