दाग़ है तो है. डिटर्जेंट के विज्ञापन की तरह अब तक राजनीति में भी दाग़ अच्छे ही हुआ करते थे. अच्छे न भी हों तो भी दाग़ देखे नहीं जाते थे. लेकिन जनाब, अब वह ज़माना बीत गया. दाग़ हैं तो रहेंगे, कोई अध्यादेश, किसी क़ानून का डिटर्जेंट अब दाग़ धोने नहीं आयेगा. पहली बार ऐसा हुआ कि समूची राजनीतिक बाजीगरी हार गयी. देश के लोकतंत्र में पहली बार ऐसा हुआ कि नेताओं की मर्ज़ी हार गयी और जनता की इच्छा जीत गयी! हालाँकि अपने यहाँ की जनता भी बड़ी ढपोरशंखी है. दूसरे के दाग़ी तो उसे बहुत बड़े दाग़ी दिखते हैं, लेकिन जात-बिरादरी अपनी हो तो दाग़ी नहीं, वह माथे का सिरमौर होता है, अपनी जाति का गौरव होता है!
इसीलिए अब तक दाग़ियों की चाँदी कट रही थी. जनता 'अपनेवाले' गौरव-पुत्रों को चुन-चुन कर भेजती जा रही थी. हर चुनाव के बाद कुछ बाहुबली, कुछ दाग़ी, कुछ महादाग़ी, कुछ सुपर दाग़ी और बढ़ जाते. संसद और विधानसभाओं में एक से एक नाम वाले बदनाम दाग़ी बेचारे शरीफ़ों के लिए क़ायदे-क़ानून बना रहे थे और देश का क़र्ज़ उतार रहे थे!
जनता जानती है और पार्टियाँ भी कि जो दाग़ी है, वह जीतेगा. आमतौर पर आसानी से जीतेगा. इसीलिए हर पार्टी के शो केस में एक से बढ़ कर एक दाग़ी सजे हुए हैं. पार्टी बड़ी हो, छोटी हो; बाँये हो, दाँये हो या बीच में हो; चाल, चरित्र, चेहरे वाली हो या कोई भी हो, इस मामले में सबकी सब ग़ज़ब की हमजोली हैं. सबके पास हर वेरायटी के दाग़ी हैं. अलग-अलग कौशल, अलग-अलग प्रतिभाओं वाले दाग़ी. वोटबल, जातिबल, बाहुबल और धनबल, राजनीति में इन सारे बलों की ज़रूरत पड़ती रहती है! इसीलिए आज हमारे सांसदों और विधायकों में से क़रीब 30 फ़ीसदी दाग़ी हैं.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जब दाग़ियों को लेकर टंटा खड़ा किया, तो देखा नहीं कि कैसे सारी पार्टियाँ एक सुर में बोलने लगीं. सर्वदलीय बैठकें हुईं, क़ानून बदलने की तैयारियाँ शुरू हुईं. लगा कि शायद एक बार फिर शाहबानो वाली कहानी तो नहीं दोहरायी जायेगी. बिल बना, पेश हुआ और राज्यसभा में 'सर्वसम्मति' से पास भी हो गया. आगे की कहानी सबको मालूम है कि बिल कैसे और कहाँ लटका और लालू यादव को बचाने के लिए कैसे आनन-फ़ानन में अध्यादेश लाने की तैयारी की गयी. भला हो राहुल गाँधी का कि अब यह सब अतीत बन चुका है. दाग़ियों की सदस्यता बचाये रखने की मुहिम की चिंदी-चिंदी राहुल के एक हथौड़े से उड़ गयी.
अब यह अलग बहस का विषय है कि राहुल ने जिस तरीक़े से अध्यादेश का मखौल उड़ाया, वह कितना सही था? उससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बड़ी ठेस पहुँची. यूपीए के कई घटक दलों को भी यह सब नागवार गुज़रा. बात सही है. राहुल दूसरे तरीक़ों से भी अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा सकते थे. तब भी शायद अध्यादेश वापस ले लिया जाता और कोई अप्रिय स्थिति न बनती. लेकिन तब शायद काँग्रेस को अपने सहयोगी दलों, मीडिया और जनता को यह समझा पाना मुश्किल होता कि अध्यादेश क्यों वापस लिया गया. क़यास लगते कि राष्ट्रपति भवन अध्यादेश लौटानेवाला था (और शायद यह क़यास ग़लत नहीं होता), इसलिए किरकिरी से बचने के लिए सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया. यानी सरकार अध्यादेश वापस भी लेती, और सरकार और काँग्रेस को बदनामी के सिवा कुछ हाथ न लगता. कोई राजनीतिक फ़ायदा नहीं पहुँचता.
अब राहुल गाँधी ने जो किया, वह भावावेश में किया, बचकानेपन में किया, बिना सोचे-समझे किया या किसी सुविचारित रणनीति के तहत किया, पता नहीं. उससे जो नुक़सान होना था, वह तो हुआ, लेकिन राहुल कम से कम यह सन्देश देने में सफल रहे कि वह राजनीति की गन्दगी बर्दाश्त नहीं करना चाहते और इसकी सफ़ाई के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं. अब अगले विधानसभा चुनावों में उनकी पहली परीक्षा होगी कि वह दाग़ियों को टिकट देते हैं या नहीं. अगर किसी एक पार्टी से भी दाग़ियों के सफ़ाये की शुरुआत हो जाय, तो यह भारतीय राजनीति के लिए बड़ी पहल होगी और राहुल इसका श्रेय ले सकते हैं. राजनीति किसी को ऐसे मौक़े बार-बार नहीं देती!
(लोकमत समाचार, 6 अक्तूबर 2013)
इसीलिए अब तक दाग़ियों की चाँदी कट रही थी. जनता 'अपनेवाले' गौरव-पुत्रों को चुन-चुन कर भेजती जा रही थी. हर चुनाव के बाद कुछ बाहुबली, कुछ दाग़ी, कुछ महादाग़ी, कुछ सुपर दाग़ी और बढ़ जाते. संसद और विधानसभाओं में एक से एक नाम वाले बदनाम दाग़ी बेचारे शरीफ़ों के लिए क़ायदे-क़ानून बना रहे थे और देश का क़र्ज़ उतार रहे थे!
जनता जानती है और पार्टियाँ भी कि जो दाग़ी है, वह जीतेगा. आमतौर पर आसानी से जीतेगा. इसीलिए हर पार्टी के शो केस में एक से बढ़ कर एक दाग़ी सजे हुए हैं. पार्टी बड़ी हो, छोटी हो; बाँये हो, दाँये हो या बीच में हो; चाल, चरित्र, चेहरे वाली हो या कोई भी हो, इस मामले में सबकी सब ग़ज़ब की हमजोली हैं. सबके पास हर वेरायटी के दाग़ी हैं. अलग-अलग कौशल, अलग-अलग प्रतिभाओं वाले दाग़ी. वोटबल, जातिबल, बाहुबल और धनबल, राजनीति में इन सारे बलों की ज़रूरत पड़ती रहती है! इसीलिए आज हमारे सांसदों और विधायकों में से क़रीब 30 फ़ीसदी दाग़ी हैं.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जब दाग़ियों को लेकर टंटा खड़ा किया, तो देखा नहीं कि कैसे सारी पार्टियाँ एक सुर में बोलने लगीं. सर्वदलीय बैठकें हुईं, क़ानून बदलने की तैयारियाँ शुरू हुईं. लगा कि शायद एक बार फिर शाहबानो वाली कहानी तो नहीं दोहरायी जायेगी. बिल बना, पेश हुआ और राज्यसभा में 'सर्वसम्मति' से पास भी हो गया. आगे की कहानी सबको मालूम है कि बिल कैसे और कहाँ लटका और लालू यादव को बचाने के लिए कैसे आनन-फ़ानन में अध्यादेश लाने की तैयारी की गयी. भला हो राहुल गाँधी का कि अब यह सब अतीत बन चुका है. दाग़ियों की सदस्यता बचाये रखने की मुहिम की चिंदी-चिंदी राहुल के एक हथौड़े से उड़ गयी.
अब यह अलग बहस का विषय है कि राहुल ने जिस तरीक़े से अध्यादेश का मखौल उड़ाया, वह कितना सही था? उससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बड़ी ठेस पहुँची. यूपीए के कई घटक दलों को भी यह सब नागवार गुज़रा. बात सही है. राहुल दूसरे तरीक़ों से भी अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा सकते थे. तब भी शायद अध्यादेश वापस ले लिया जाता और कोई अप्रिय स्थिति न बनती. लेकिन तब शायद काँग्रेस को अपने सहयोगी दलों, मीडिया और जनता को यह समझा पाना मुश्किल होता कि अध्यादेश क्यों वापस लिया गया. क़यास लगते कि राष्ट्रपति भवन अध्यादेश लौटानेवाला था (और शायद यह क़यास ग़लत नहीं होता), इसलिए किरकिरी से बचने के लिए सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया. यानी सरकार अध्यादेश वापस भी लेती, और सरकार और काँग्रेस को बदनामी के सिवा कुछ हाथ न लगता. कोई राजनीतिक फ़ायदा नहीं पहुँचता.
अब राहुल गाँधी ने जो किया, वह भावावेश में किया, बचकानेपन में किया, बिना सोचे-समझे किया या किसी सुविचारित रणनीति के तहत किया, पता नहीं. उससे जो नुक़सान होना था, वह तो हुआ, लेकिन राहुल कम से कम यह सन्देश देने में सफल रहे कि वह राजनीति की गन्दगी बर्दाश्त नहीं करना चाहते और इसकी सफ़ाई के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं. अब अगले विधानसभा चुनावों में उनकी पहली परीक्षा होगी कि वह दाग़ियों को टिकट देते हैं या नहीं. अगर किसी एक पार्टी से भी दाग़ियों के सफ़ाये की शुरुआत हो जाय, तो यह भारतीय राजनीति के लिए बड़ी पहल होगी और राहुल इसका श्रेय ले सकते हैं. राजनीति किसी को ऐसे मौक़े बार-बार नहीं देती!
(लोकमत समाचार, 6 अक्तूबर 2013)
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