एक गाना था. झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो. लेकिन अपने देश में काटनेवाले कौवे कभी दिखे नहीं. इसलिए सच बोलनेवाले भी अकसर कम ही दिखते हैं! कम दिखते हैं या बिलकुल विलुप्त हो चुके हैं, इस पर बड़े-बड़े सेमिनार हो सकते हैं और तब भी शायद यह तय न हो पाये कि आज के दौर में कोई सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहीं बचा है या नहीं! क्योंकि सच यह है कि जो भी, जहाँ भी, जब भी, जैसे भी झूठ बोल सकने की रत्ती भर भी हैसियत रखता है, वह मौक़ा नहीं चूकता. कहते हैं कि झूठ सफ़ेद रंग का होता है. इसलिए आजकल कुछ नेताओं ने सफ़ेद कुरते पहनने छोड़ दिये! अब कुरते रंगीन हो गये तो क्या बातों का रंग भी बदल जायेगा?
लेकिन श्रीमान, हमारे नेता कभी-कभी सच भी बोलते हैं! मज़ाक़ नहीं, सच! वे किसी कौवे-औवे से नहीं डरते. फिर भी कभी-कभार सच बोल बैठते हैं. ग़लती से. और जब ग़लती हो जाती है, तो माफ़ी भी माँगनी पड़ती है. अब न उन्हें वोट माँगते शर्म आती है और न माफ़ी माँगते. सो आज माफ़ी माँगी, कल फिर ग़लती से सच बोल गये, फिर माफ़ी माँगी, अगली बार फिर वही सच ज़बान से ग़लती से फिसल पड़ा तो फिर माफ़ी.....सिलसिला चलता रहता है, ग़लती कभी दुरुस्त नहीं होती!
पढ़ कर आप थोड़ा हैरान-परेशान होंगे. ऐसा कौन-सा सच है जो छिपाये छिपता नहीं, दबाये दबता नहीं? सुनते हैं, कुछ रोग होते हैं, लाख दवाई करो, दब-दब कर उभर आते हैं. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है. आ से आदमी, औ से औरत! जब उन्हें यह रट्टा रटाया गया था, तब बच्चों की किताबों की तसवीरों में औरतें गज़ भर लम्बी घूँघटों में छपती थीं. आ से आदमी यानी एक अड़ियल-कड़ियल मर्द की तसवीर. औ से औरत, यानी घूँघट और लाज के वज़न से दोहरी होती कपड़ों की एक पोटलीनुमा औरत की तसवीर. बस उन्हें अब तक यही याद है कि औरत घूँघट में ही रहती है!
इसलिए कभी किसी बड़े पुराने घिस्सू समाजवादी को वे 'परकटी' नज़र आने लगती हैं, क्योंकि वे संसद में महिला आरक्षण की ज़ोर-शोर से माँग कर रही थीं! कभी महामहिम राष्ट्रपति जी के पुत्र को वे 'डेंटेड-पेंटेड' दिखने लगती हैं, क्योंकि उन्हे अच्छा नहीं लगता कि महिलाएँ बलात्कार के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जलायें! कोलकाता में जब बलात्कार होता है, तो ग़रीबों की ममता से भरी सर्वदा-जुझारू दीदी को भी शहरी लड़कियों के पहनावे और चाल-ढाल में ही खोट नज़र आता है. उधर, सब कुछ भगवा-भगवा देखनेवाले संघ के मुखिया भी बड़े होमवर्क के बाद खोज करते हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध शहरों में होते हैं, सब पश्चिमी संस्कृति का दोष है, गाँवों में कहाँ कोई बलात्कार होता है भला? उन्हीं के 'परिवार' के एक पूर्व-प्रचारक और अब नये-नवेले विकासवाचक जी ने एक दिन लोगों से पूछा कि इस देश में कभी किसी ने 50 करोड़ की गर्ल फ़्रेंड देखी है! देखा आपने, इस मामले में क्या ज़बर्दस्त एका है. समाजवादी हों, संघी हों या काँग्रेसी या कोई और---सबको लगता है कि पढ़ी-लिखी शहरी औरतें ही सारी मुसीबत की जड़ हैं! क्यों? क्या इसका जवाब इतना मुश्किल है?
और अब तरुण तेजपाल काँड के बाद फिर कुछ 'महिला-हितैषी' चिन्तित हो उठे हैं. एक हैं नरेश अग्रवाल. उत्तर प्रदेश के हैं. कितनी पार्टियाँ बदल चुके, उन्हें भी याद न होगा. वह कहते है कि इस विवाद से अब लड़कियों को नौकरी मिलना मुश्किल हो जायेगा! लोग डरने लगे हैं कि लड़कियों को नौकरी दी तो कौन जाने कब यौन शोषण के आरोप में फँस जायें! अग्रवाल जी कहना क्या चाहते हैं? यौन शोषण होता है तो लड़कियाँ चुपचाप सहती रहें, बोले नहीं! उनकी बात का तो यही एक मतलब निकलता है!
औरतें जब तक चुपचाप सहती रहें, तब तक सब ठीक है. बात हमेशा परदे में रहती है! इसीलिए संघ वालों को लगता है कि गाँवों और छोटे शहरों वाले 'भारत' में सब कुछ ठीकठाक चलता है. क्योंकि लाज और घर की नाक का लिहाज़ तोड़ कर औरतें बोल नहीं पाती कि उन्हें कब क्या चुपचाप पी जाना पड़ा. फिर भी जनाब, उन इलाकों में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध का ग्राफ़ कहीं से कम नहीं. हाँ, वहाँ सब चुपचाप निपटा दिया जाता है! लेकिन शहर की महिलाएँ बोलने लगी हैं, अपनी मौजूदगी हर जगह दर्ज कराने लगी हैं, इसलिए प्रभुजनों को अपना आसन डोलते हुए दिखने लगा है. हुज़ूर, अभी तो अपने देश में काम करनेवाली आबादी में महिलाओं का हिस्सा 22 फ़ीसदी से कुछ ही ज़्यादा है और इस मामले में 131 देशों में भारत नीचे से 11वें नम्बर पर है. अगर अभी से आप दुबले होने लगे, तो तब क्या होगा जब महिलाएँ नौकरी में आधा हिस्सा माँगेंगी. आपकी सूचना के लिए बता दें कि नार्वे में कामकाजी आबादी में महिलाओं का हिस्सा 69 प्रतिशत है. तो कुँए से बाहर निकल कर देखिए कि आसमान का विस्तार कितना अनन्त है!
(लोकमत समाचार, 30 नवम्बर 2013)
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