Saturday, 7 December 2013

अतीत में जमी जड़ें और भविष्य का पेड़!

आज कुछ बात सिर्फ़ और सिर्फ़ युवाओं से! कभी सिर्फ़ अमिताभ बच्चन 'एंग्री यंगमैन' हुआ करते थे. वह पुराना ज़माना था. आज तो जितने 'यंग' हैं, सभी 'एंग्री' हैं. चारों तरफ़ ग़ुस्सा ही ग़ुस्सा ही दिखता है. तनतनाये हुए युवा! भन्नाये हुए युवा! निराश, हताश, बेचैन, बे-आस. वे बड़ी नौकरियाँ कर रहे हों या अभी रोज़गार की तलाश में हों, ठीक-ठीक कमा-खा रहे हों या अभी पढ़ाई में ही लगे हों, युवाओं का मूड बहुत बिगड़ा हुआ है!

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हर तरफ़ यह ग़ुस्सा, यह कसमसाहट, यह छटपटाहट दिखती है. ऐसा लगता है कि हम सब किसी भयानक जंगल में फँस गये हों, अँधेरा घना और भुतहा हो, चारों तरफ़ बीहड़ कँटीली झाड़ियाँ हों और कहीं कोई रास्ता न हो, कहीं कोई रोशनी न हो. 

हालाँकि तसवीर का दूसरा पहलू यह है कि आज देश की साक्षरता दर 74 प्रतिशत से भी ज़्यादा है. पहले से कई गुना अधिक नौकरियाँ हैं, बेरोज़गारी पहले से कहीं कम है, पढ़ने-लिखने के और विदेशों में जा कर नौकरियाँ करने के तमाम अवसर हैं. फिर क्यों इतनी हताशा है? हमें आज़ादी मिले 66 साल हुए हैं. इस यात्रा को हम अगर दो हिस्सों में बाँट दें तो आज़ादी के 33 साल बाद यानी 1980 में हमारी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 266 डालर थी, जो 2012 में बढ़ कर 1492 डालर हो गयी. यानी पाँच गुना ज़्यादा! यह आँकड़ा किसी सरकार की सफलता-असफलता गिनाने के लिए नहीं दिया जा रहा है, बल्कि 1980 के बाद जन्मे युवाओं को यह बताने के लिए दिया जा रहा है कि आप अगर थोड़ा पीछे मुड़ कर देख लें तो आपको अपना वर्तमान उतना कँटीला नहीं लगेगा.
मुझे लगता है कि मूल समस्या यही है कि अब कोई पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहता!

आज सूचना क्रान्ति का ज़माना है. हर जानकारी एक क्लिक पर हाज़िर. लेकिन सूचनाओं की इस सुनामी की हाहाकारी अफ़रातफ़री के बीच सत्य, तथ्य और इतिहास अकसर किसी को दिख ही नहीं पाते! इसलिए अकसर यह होता है कि हमें दुनिया में अपने सिवा सब कुछ बहुत चमकीला दिखता है. चाहे भले ही यह चमक सिर्फ ऊपर से चढ़ाये गये सोने के पानी जैसी हो, जो हमें उस समय चौंधिया तो देती है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह तो पीतल का माल था. बेकार!

कई बार यह चमक असली भी हो सकती है, होती है. हम कहते हैं 'वाॅव'....'आॅसम'. लेकिन हमें यह एहसास कहाँ कि ठहर कर यह देखें कि इस 'वाॅव फ़ैक्टर' को पाने में कितने बरस की कड़ी मेहनत, अनुशासन, लगन लगी है. थोड़ा पीछे मुड़ कर देखेंगे तो पायेंगे कि किसी भदेस, खुरदुरी, बदरंग स्थिति को बदल कर 'आॅसम' बना देने की कहानी कितनी लम्बी, जीवटभरी है और उसमें कितने लाखों अनाम गुमनाम सितारों का ख़ून-पसीना लगा है. कभी आपने सोचा कि अगर वह अतीत न होता तो क्या यह वर्तमान सम्भव था?
यह 'स्पीड एज' है. आप वैज्ञानिक क्रान्ति के उस मोड़ पर पैदा हुए हैं, जहाँ कोई मशीन, कोई तकनालाॅजी, कोई डिवाइस, कोई थ्योरी, कोई खोज ज़्यादा दिन नहीं ठहर सकती, जो आज बहुत महान है, कल उसकी जगह रद्दी की टोकरी में ही है. लेकिन फिर भी यह बुनियादी बात तो समझनी पड़ेगी कि अतीत से सीखे बिना आप भविष्य नहीं गढ़ पायेंगे! 

आज जब मैं देखता हूँ तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स को, तो दिल बैठता है. युवाओं की आँखों में तैरते सपनों के बजाय विक्षोभ का गर्द-ग़ुबार, आक्रोश की लपटें, तिरस्कार का लावा और घृणा का कीचड़ दिखता है. विक्षोभ और आक्रोश इसलिए कि उन्हें लगता है कि राजनीति सड़ चुकी है और सरकारें चला रहे लोग सिर्फ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उन्हें देश की नहीं केवल अपनी जेबें भरने की फ़िक्र है. अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुसलमान में बँटी ज़हरीली मानसिकता पहले से कहीं मुखर दिखती है क्योंकि हर वर्ग के युवाओं को लगता है कि वे उन अवसरों से वंचित हो रहे हैं, जिन पर उनका हक़ है. उन्हें लगता है कि उनकी पुरानी पीढ़ियाँ मूर्ख और फिसड्डी थीं, इसलिए जो कुछ भी पुराना है, वह तिरस्कार योग्य है.

लेकिन क्या यही सच है? आप पिछली पीढ़ियों से कहीं ज़्यादा उन्नत हैं, कहीं ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं और कहीं ज़्यादा सूचनाएँ आपके हाथ में हैं. होना तो यह चाहिए था कि सत्य और तथ्य आपको पानी की तरह साफ़ दिखना चाहिए था. लेकिन क्या सचमुच ऐसा हो पा रहा है? नहीं. अगर ऐसा होता तो एक बटा दो, दो बटा चार वर्तमान सामने न होता और भविष्य ऐसा कुम्हलाया हुआ न लगता!

आपके इतिहास और वर्तमान में बहुत कुछ अच्छा भी है और कुछ बुरा भी. यह तय आपको करना है कि आप अपना भविष्य बनाने के लिए अपने अतीत और वर्तमान से क्या चुनते हैं---अच्छाइयों को या बुराइयों को? अब यह तो एक बच्चा भी बता देगा कि आप इनमें से जिसे चुनेंगे, भविष्य वैसा ही बनेगा! आप तो बच्चों से ज़्यादा समझदार हैं! हैं न! 

और अन्त में एक और बात. अतीत से आप सिर्फ सीखते ही नहीं. वहाँ आपकी जड़ें होती हैं. पेड़ कितना भी ऊँचा हो, आसमान छूता हो, फिर भी जड़ें मिट्टी के भीतर गहरे अँधेरों में दबी होती हैं और पेड़ को ज़िन्दा रहने के लिए भोजन पहुँचाती रहती हैं. इसलिए अतीत में जमी जड़ों के बिना भविष्य का पेड़ खड़ा नहीं हो सकता!
(लोकमत समाचार, 7 दिसम्बर 2013)

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