अजब देश है अपना. पता नहीं क्या बात है कि प्याज़ बिना गाड़ी चलती नहीं हमारी! सदियों पुराने ज़माने से यह प्राणप्यारे जियादुलारे प्याज़ का कृतज्ञ रहा है. तब जिसके नसीब में कुछ नहीं होता था, उसे प्याज़-रोटी तो नसीब थी! माबदौलत राजा-महाराजा लोग प्याज़ की बदौलत ही चैन की नींद सोया करते थे. चलो ग़रीबों को कुछ मिले न मिले, पेट भरने के लिए प्याज़ और रूखी-सूखी रोटियाँ तो मिल ही जायेंगी! प्रजा ख़ुश रहेगी और राज्य से लेकर राजमहल तक शान्ति रहेगी. बग़ावत का डर नहीं होगा, जब तक ग़रीबों को प्याज़ मिलता रहेगा!
अब लगता है कि समय सचमुच बदल गया है. ग़रीब तो सपने में भी प्याज़ देख पाने का सपना नहीं देख सकता! प्याज़ तो एक मायावी इन्द्रजाल बन चुका है! करोड़ों-अरबों कमाने का जादू! एक बड़ा जादूगर है, जो जादू दिखाता है और प्याज़ देखते ही देखते छू मंतर हो जाता है. सब भौंचक्के! अभी तो चारों तरफ़ प्याज़ का इतना अम्बार लगा था. लाखों टन प्याज़! फिर यह कैसा ग़ज़ब जादू था कि वह आँखों से ओझल हो गया? अब जनाब जादू है तो सब सम्भव है. पहले दालों पर यही जादू चला था, चीनी पर चला था, अब जादूगर का दिल प्याज़ पर आ गया है. जब वह खेल दिखाता है और मंतर मारता है, अक्रा बक्रा बम्बे बो गड़प, तो चीज़ ग़ायब! अब ढूँढते रहो, चाहिए तो जेब ढीली करो! फिर सब बोलते हैं त्राहिमाम, त्राहिमाम! रोते-रोते पखवाड़े बीते, महीने बीते, जादूगर की जेब भर चुकी होती है. वह बोलता है अक्रा बक्रा बम्बे दो...दो...दो, और चीज़ हाज़िर!
बचपन में हमने बहुत जादू देखे, सोचते थे बस इन्द्रजाल सीख लो और चाहे जिसको बकरा बना दो! बड़े हुए तो पता चला कि ये जादू-वादू तो कुछ होता ही नहीं है. सब ट्रिक है बन्धु! अपनी ही आँखों का छलावा! हम तो बड़े हो गये, समझदार हो गये, जादू की पोल-पट्टी जान गये, सो अब उसके झाँसे में नहीं आते. पर बेचारी यूपीए सरकार! अभी कुल नौ साल की ही तो है. बिलकुल बच्चा है जी! सो वह तो जादूगर से बहुत डरती है. पता नहीं कब वह उसे बकरा बना दे और डकार जाये या फिर हमेशा-हमेशा के लिए मक्खी बना कर उड़ा दे! सो पिछले पाँच साल से वह डरी-डरी यह उड़न छू वाला जादू देख रही है. दाल ग़ायब, चीनी ग़ायब, प्याज़ ग़ायब! जादूगर तो दादी अम्मा की कहानियों जैसा बड़ा ख़तरनाक और सरकार एक छोटा-सा बच्चा! भला कहाँ मुक़ाबला है दोनों का. इसलिए जब जादूगर जादू दिखाता है, तो सरकार गिड़गिड़ाने लगती है, हे जादूगर तेरी जेब की प्यास भर गयी हो तो अब हमारी जान बख़्श दे! आख़िर जादूगर का दिल पसीजता है! जी हाँ, उसके पास जेब के साथ-साथ दिल भी है. उसे दोनों का ख़याल रखना पड़ता है. आख़िर ग़ायब हुआ सामान लौट आता है. बच्चो बजाओ ताली!
आज ही एक अख़बार में पढ़ रहा था कि पिछले दस सालों में प्याज़ का उत्पादन 42 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर क़रीब 163 लाख मीट्रिक टन हो गया, यानी क़रीब-क़रीब चार सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. जबकि 2003 में हमारी आबादी 1.05 अरब थी, जो दस साल बाद अब 1.23 अरब है. यानी दस साल में कुल क़रीब 18 प्रतिशत बढ़ोत्तरी. तो बताइये इतना प्याज़ जाता कहाँ है. हर आदमी सब कुछ छोड़ कर सिर्फ़ प्याज़ ही खा रहा है क्या? आबादी सिर्फ़ 18 प्रतिशत बढ़े और उत्पादन 400 प्रतिशत और फिर भी बाज़ार में प्याज़ में न मिल रहा हो! ऐसा अद्भुत चमत्कार हमारे ही देश में हो सकता है.
न हमारे यहाँ कभी दालों का उत्पादन घटा था, न गन्ने का और न प्याज़ का. फिर भी पिछले पाँच सालों में इनका अभूतपूर्व संकट देश में कैसे खड़ा हो गया? किसी के पास कोई जवाब नहीं है! यह भ्रष्टाचार का नवीनतम आविष्कार है. माल छिपाओ, दाम बढ़ाओ और लूटो. पाँच साल से यह सिलसिला चल रहा है. हर बार सरकार बस टुकुर-टुकुर देखती रहती है. राजाओं-महाराजाओं के दौर में न जीडीपी थी, न विकास दर की चिड़िया, लोग अकाल और महामारी से भले मरते हों, लेकिन प्याज़ सोने जैसा क़ीमती शायद कभी नहीं था. वरना बेचारे ग़रीब प्याज़- रोटी कैसे खाते? कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही राजा होती है, होती होगी. लेकिन एक सरकार और कुछ जादूगर भी होते हैं न!
(लोकमत समाचार, 26 अक्तूबर 2013)
अब लगता है कि समय सचमुच बदल गया है. ग़रीब तो सपने में भी प्याज़ देख पाने का सपना नहीं देख सकता! प्याज़ तो एक मायावी इन्द्रजाल बन चुका है! करोड़ों-अरबों कमाने का जादू! एक बड़ा जादूगर है, जो जादू दिखाता है और प्याज़ देखते ही देखते छू मंतर हो जाता है. सब भौंचक्के! अभी तो चारों तरफ़ प्याज़ का इतना अम्बार लगा था. लाखों टन प्याज़! फिर यह कैसा ग़ज़ब जादू था कि वह आँखों से ओझल हो गया? अब जनाब जादू है तो सब सम्भव है. पहले दालों पर यही जादू चला था, चीनी पर चला था, अब जादूगर का दिल प्याज़ पर आ गया है. जब वह खेल दिखाता है और मंतर मारता है, अक्रा बक्रा बम्बे बो गड़प, तो चीज़ ग़ायब! अब ढूँढते रहो, चाहिए तो जेब ढीली करो! फिर सब बोलते हैं त्राहिमाम, त्राहिमाम! रोते-रोते पखवाड़े बीते, महीने बीते, जादूगर की जेब भर चुकी होती है. वह बोलता है अक्रा बक्रा बम्बे दो...दो...दो, और चीज़ हाज़िर!
बचपन में हमने बहुत जादू देखे, सोचते थे बस इन्द्रजाल सीख लो और चाहे जिसको बकरा बना दो! बड़े हुए तो पता चला कि ये जादू-वादू तो कुछ होता ही नहीं है. सब ट्रिक है बन्धु! अपनी ही आँखों का छलावा! हम तो बड़े हो गये, समझदार हो गये, जादू की पोल-पट्टी जान गये, सो अब उसके झाँसे में नहीं आते. पर बेचारी यूपीए सरकार! अभी कुल नौ साल की ही तो है. बिलकुल बच्चा है जी! सो वह तो जादूगर से बहुत डरती है. पता नहीं कब वह उसे बकरा बना दे और डकार जाये या फिर हमेशा-हमेशा के लिए मक्खी बना कर उड़ा दे! सो पिछले पाँच साल से वह डरी-डरी यह उड़न छू वाला जादू देख रही है. दाल ग़ायब, चीनी ग़ायब, प्याज़ ग़ायब! जादूगर तो दादी अम्मा की कहानियों जैसा बड़ा ख़तरनाक और सरकार एक छोटा-सा बच्चा! भला कहाँ मुक़ाबला है दोनों का. इसलिए जब जादूगर जादू दिखाता है, तो सरकार गिड़गिड़ाने लगती है, हे जादूगर तेरी जेब की प्यास भर गयी हो तो अब हमारी जान बख़्श दे! आख़िर जादूगर का दिल पसीजता है! जी हाँ, उसके पास जेब के साथ-साथ दिल भी है. उसे दोनों का ख़याल रखना पड़ता है. आख़िर ग़ायब हुआ सामान लौट आता है. बच्चो बजाओ ताली!
आज ही एक अख़बार में पढ़ रहा था कि पिछले दस सालों में प्याज़ का उत्पादन 42 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर क़रीब 163 लाख मीट्रिक टन हो गया, यानी क़रीब-क़रीब चार सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. जबकि 2003 में हमारी आबादी 1.05 अरब थी, जो दस साल बाद अब 1.23 अरब है. यानी दस साल में कुल क़रीब 18 प्रतिशत बढ़ोत्तरी. तो बताइये इतना प्याज़ जाता कहाँ है. हर आदमी सब कुछ छोड़ कर सिर्फ़ प्याज़ ही खा रहा है क्या? आबादी सिर्फ़ 18 प्रतिशत बढ़े और उत्पादन 400 प्रतिशत और फिर भी बाज़ार में प्याज़ में न मिल रहा हो! ऐसा अद्भुत चमत्कार हमारे ही देश में हो सकता है.
न हमारे यहाँ कभी दालों का उत्पादन घटा था, न गन्ने का और न प्याज़ का. फिर भी पिछले पाँच सालों में इनका अभूतपूर्व संकट देश में कैसे खड़ा हो गया? किसी के पास कोई जवाब नहीं है! यह भ्रष्टाचार का नवीनतम आविष्कार है. माल छिपाओ, दाम बढ़ाओ और लूटो. पाँच साल से यह सिलसिला चल रहा है. हर बार सरकार बस टुकुर-टुकुर देखती रहती है. राजाओं-महाराजाओं के दौर में न जीडीपी थी, न विकास दर की चिड़िया, लोग अकाल और महामारी से भले मरते हों, लेकिन प्याज़ सोने जैसा क़ीमती शायद कभी नहीं था. वरना बेचारे ग़रीब प्याज़- रोटी कैसे खाते? कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही राजा होती है, होती होगी. लेकिन एक सरकार और कुछ जादूगर भी होते हैं न!
(लोकमत समाचार, 26 अक्तूबर 2013)
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