Saturday, 18 January 2014

'आप' ऐसे तो अपना आपा मत खोइए!

----क़मर वहीद नक़वी 


ज़माना आजकल जोश का है. अपने भीतर जोश भरने के गुर आजकल बड़े-बड़े गुरू सिखा रहे हैं. पर्सनालिटी बेचने वाली छोटी-बड़ी दुकानें हों, या मोटी-मोटी फ़ीस वाले मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, जोश की बूटी हर जगह बड़ी चमका-दमका कर दी जाती है. ऐसा लगता है कि संजीवनी बूटी की तरह शायद यह दस-बीस साल पहले अचानक किसी के हाथ लग गयी हो. इससे पहले की 'मरियल' पीढ़ियाँ इस रामबाण नुस्ख़े से शायद वंचित ही थीं! वरना नये ज़माने की करियर पाठशालाओं में होश खो कर जोश-जोश का ऐसा हल्ला क्यों मचता? गिटपिटिया ज़ुबान में इसे कहते हैं ट्रेंडिंग! या 'बज़ वर्ड!' नहीं समझे? हिन्दी में बताऊँ? तो मतलब है भेड़चाल! अच्छा नहीं लगा न आपको? वैसे ही जैसे किसी के पालतू कुत्ते को अगर कुत्ता कह दो, तो कुत्ते के बजाय ख़ुद ही आपको काट खाने को दौड़ पड़े. 'डाॅग' या 'डाॅगी' कहिए तो ठीक, कुत्ता कह दिया तो आपको कुत्ते की तरह दुत्कार कर भगा देगा! भेड़चाल, यानी एक भेड़ जिधर जाय, सारी भेड़ें उधर ही चल पड़ें. ट्रेंडिंग यानी जिसका ट्रेंड चल पड़ा हो, यानी सबके सब वही करने लगे हों!

तो आजकल जोश का, जूनून यानी 'पैशन' का ट्रेंड है! पैशन नहीं तो आप निकम्मे! फूटी कौड़ी के भी नहीं. हर जगह से दुरदुरा कर भगा दिये जायेंगे. जोश में कुछ भी आँय-बाँय करते दिख रहे हों, तो छा गये सरकार! दुनिया सलाम करेगी! ज़माना ही जोश का है, वही बिकता है, वही दिखता है, वही चलता है. अब यह ट्रेंडई है या कुछ और, हम कह नहीं सकते, लेकिन आजकल अपने 'आप' वाले भाई-बन्धु भी बड़े जोश में दिख रहे हैं! ऐसे में कभी-कभार होश बहक कर कब साथ छोड़ जाये, अकसर पता नहीं चलता. अब हम तो ठहरे पुरनिया मनई (यानी पुराने ज़माने के आदमी)! हम तो यह देख-देख कर कुड़मुड़ायेंगे ही बबुआ! 'आप' जिस जोश से दिल्ली की सरकार चला रहे हैं, उससे अच्छे-अच्छों को पसीना छूट रहा है!

'आप' ऐसे आपा मत खोइए! ठीक है कि आप नये हैं. राजनीति की धन्धेबाज़ी नहीं आती! सच कहें तो आपके लिए यह बड़ी अच्छी बात है कि आप पेशेवर राजनीति वाले नहीं हैं. आपको बहुत-सी बुरी छूत नहीं लगी है. डर्टी ट्रिक्स जानते नहीं आप. इसलिए जनता को उम्मीद है कि आप ग़लतियाँ भले करें, तमाम घुटे घाघ नेताओं की तरह उसे मूड़ेंगे नहीं! सरकार बनाने से पहले तक आपके हर पैंतरे से लोग विस्मित थे. ईवीएम मशीन से लेकर उसके बाद रचे गये हर चक्रव्यूह को आपने चुटकियों में ध्वस्त कर दिया. ऐसी राजनीति देश ने देखी न थी. देखते-देखते आपके समर्थकों का सैलाब उमड़ने लगा. इसलिए नहीं कि चुनाव में आपको अच्छा समर्थन मिला था, बल्कि इसलिए कि चुनाव बाद की 'आप' की रीत-नीत से लोगों को लगा कि आप वाक़ई दूसरों से अलग हैं, आप वाक़ई ऐसा कुछ करेंगे, जिसे पीढ़ियाँ याद रखेंगी, आप वाक़ई काजल की कोठरी को रगड़-घिस कर ऐसा कर देंगे कि कालिख अतीत हो जाय.

दिल्ली में बहुतों ने आपको वोट नहीं दिया, लेकिन वे अपने-अपने टीवी सेटों से चिपके आप पर दिल से फूल बरसा रहे थे, जब आप सरकार बनाने के लिए शपथ ले रहे थे. सारा देश जैसे ईद और दीवाली मना रहा था. सब आपका हौसला बढ़ा रहे थे. सिर्फ़ आपका ही नहीं, वे सब ख़ुद अपना हौसला भी बढ़ा रहे थे. इसलिए कि आप में वे राजनीति की जैसी मूरत देख रहे थे, वे चाहते थे कि हर पार्टी अब ऐसे ही संस्कार सीखे. तमाम दिलजली जनता को आप नये मरहम की तरह लगे थे. लेकिन आप अपने दिल पर हाथ रख कर बतायें कि क्या सरकार ऐसे ही चलती है? और क्या सरकार ऐसे ही चलेगी?
आप इन्क़लाब ज़िन्दाबाद की बात करते हो. इन्क़लाब वाले कहते हैं कि इसके लिए जोश और जुनून ज़रूरी होता है! अजीब बात है कि आज कारपोरेट और पूँजीवाद की नाव पर सवार दुनिया में घर, सड़क, बाज़ार, स्कूल से दफ़्तर तक जोश-जुनून का ही नशा छाया हुआ है. आपके यहाँ इन्क़लाब भी है और कारपोरेट भी. सब गड्डमगड्ड दिखता है. बहरहाल़़, अब इस पर बहस का मौक़ा नहीं है. बहस इस पर है कि जोश तो ठीक है, लेकिन होश कहाँ है. उसे भी ढूँढ कर लाइए और साथ रखिए! सोचिए, समझिए, ठहरिए, फिर सोचिए, समझिए, तब बोलिए और करिए. बस इतना ही करना है आपको. कि जो करना है, उसके पहले थोड़ा रुक कर सोचना है कि यह करना ठीक है या नहीं. जो सरकार में हैं, उन्हें भी और जो सरकार में नहीं हैं, उन्हें भी सोचना चाहिए कि लोग उनसे क्या आस लगाये बैठे हैं. मंत्री किसी बे सिर-पैर की बात पर पुलिस अफ़सर से भिड़ जाये, कोई मंत्री कहीं ज़िद कर धरने पर बैठ जाय, मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर की शिकायत लेकर लेफ़्टिनेंट गवर्नर तक दौड़े, तो सरकार क्या रह गयी भला? 
बदलाव बड़ा सुन्दर सपना होता है, लेकिन उसे ला पाना अकसर 'असम्भव' से कुछ ही कम कठिन होता है. कुछ इतिहास से भी सीखिए. असम में क्यों फ़ेल हो गयी युवा छात्रों की पहली सरकार? आन्ध्र में सपनों के सौदागर एन टी रामराव क्यों ढर्रे की भेंट चढ़ गये? वीपी सिंह क्यों उलझ कर गिर पड़े? जनता पार्टी क्यों असमय काल-कवलित हो गयी? ये सबके सब बदलाव के झुनझुने लेकर आये थे और खेत रहे. आप इतिहास में कहाँ नाम दर्ज कराना चाहेंगे? क्या इसी पंक्ति में पाँचवे नम्बर पर? हम ऐसा नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि आप फलें-फूलें और राजनीति की ऐसी लकीर खींचे कि आज नहीं तो कल सबको उस पर चलना पड़े. वोटों की राजनीति में कौन हारता-जीतता है, मतलब नहीं. मतलब है तो इससे कि देश की राजनीति जनता के लिए बदले.
(लोकमत समाचार, 18 जनवरी 2014)

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