Saturday, 30 November 2013

कौन डरता है शहर की औरतों से?

एक गाना था. झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो. लेकिन अपने देश में काटनेवाले कौवे कभी दिखे नहीं. इसलिए सच बोलनेवाले भी अकसर कम ही दिखते हैं! कम दिखते हैं या बिलकुल विलुप्त हो चुके हैं, इस पर बड़े-बड़े सेमिनार हो सकते हैं और तब भी शायद यह तय न हो पाये कि आज के दौर में कोई सत्यवादी हरिश्चन्द्र कहीं बचा है या नहीं! क्योंकि सच यह है कि जो भी, जहाँ भी, जब भी, जैसे भी झूठ बोल सकने की रत्ती भर भी हैसियत रखता है, वह मौक़ा नहीं चूकता. कहते हैं कि झूठ सफ़ेद रंग का होता है. इसलिए आजकल कुछ नेताओं ने सफ़ेद कुरते पहनने छोड़ दिये! अब कुरते रंगीन हो गये तो क्या बातों का रंग भी बदल जायेगा? 
लेकिन श्रीमान, हमारे नेता कभी-कभी सच भी बोलते हैं! मज़ाक़ नहीं, सच! वे किसी कौवे-औवे से नहीं डरते. फिर भी कभी-कभार सच बोल बैठते हैं. ग़लती से. और जब ग़लती हो जाती है, तो माफ़ी भी माँगनी पड़ती है. अब न उन्हें वोट माँगते शर्म आती है और न माफ़ी माँगते. सो आज माफ़ी माँगी, कल फिर ग़लती से सच बोल गये, फिर माफ़ी माँगी, अगली बार फिर वही सच ज़बान से ग़लती से फिसल पड़ा तो फिर माफ़ी.....सिलसिला चलता रहता है, ग़लती कभी दुरुस्त नहीं होती! 
पढ़ कर आप थोड़ा हैरान-परेशान होंगे. ऐसा कौन-सा सच है जो छिपाये छिपता नहीं, दबाये दबता नहीं? सुनते हैं, कुछ रोग होते हैं, लाख दवाई करो, दब-दब कर उभर आते हैं. यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला है. आ से आदमी, औ से औरत! जब उन्हें यह रट्टा रटाया गया था, तब बच्चों की किताबों की तसवीरों में औरतें गज़ भर लम्बी घूँघटों में छपती थीं. आ से आदमी यानी एक अड़ियल-कड़ियल मर्द की तसवीर. औ से औरत, यानी घूँघट और लाज के वज़न से दोहरी होती कपड़ों की एक पोटलीनुमा औरत की तसवीर. बस उन्हें अब तक यही याद है कि औरत घूँघट में ही रहती है! 
इसलिए कभी किसी बड़े पुराने घिस्सू समाजवादी को वे 'परकटी' नज़र आने लगती हैं, क्योंकि वे संसद में महिला आरक्षण की ज़ोर-शोर से माँग कर रही थीं! कभी महामहिम राष्ट्रपति जी के पुत्र को वे 'डेंटेड-पेंटेड' दिखने लगती हैं, क्योंकि उन्हे अच्छा नहीं लगता कि महिलाएँ बलात्कार के ख़िलाफ़ मोमबत्तियाँ जलायें! कोलकाता में जब बलात्कार होता है, तो ग़रीबों की ममता से भरी सर्वदा-जुझारू दीदी को भी शहरी लड़कियों के पहनावे और चाल-ढाल में ही खोट नज़र आता है. उधर, सब कुछ भगवा-भगवा देखनेवाले संघ के मुखिया भी बड़े होमवर्क के बाद खोज करते हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध शहरों में होते हैं, सब पश्चिमी संस्कृति का दोष है, गाँवों में कहाँ कोई बलात्कार होता है भला? उन्हीं के 'परिवार' के एक पूर्व-प्रचारक और अब नये-नवेले विकासवाचक जी ने एक दिन लोगों से पूछा कि इस देश में कभी किसी ने 50 करोड़ की गर्ल फ़्रेंड देखी है! देखा आपने, इस मामले में क्या ज़बर्दस्त एका है. समाजवादी हों, संघी हों या काँग्रेसी या कोई और---सबको लगता है कि पढ़ी-लिखी शहरी औरतें ही सारी मुसीबत की जड़ हैं! क्यों? क्या इसका जवाब इतना मुश्किल है?
और अब तरुण तेजपाल काँड के बाद फिर कुछ 'महिला-हितैषी' चिन्तित हो उठे हैं. एक हैं नरेश अग्रवाल. उत्तर प्रदेश के हैं. कितनी पार्टियाँ बदल चुके, उन्हें भी याद न होगा. वह कहते है कि इस विवाद से अब लड़कियों को नौकरी मिलना मुश्किल हो जायेगा! लोग डरने लगे हैं कि लड़कियों को नौकरी दी तो कौन जाने कब यौन शोषण के आरोप में फँस जायें! अग्रवाल जी कहना क्या चाहते हैं? यौन शोषण होता है तो लड़कियाँ चुपचाप सहती रहें, बोले नहीं! उनकी बात का तो यही एक मतलब निकलता है! 
औरतें जब तक चुपचाप सहती रहें, तब तक सब ठीक है. बात हमेशा परदे में रहती है! इसीलिए संघ वालों को लगता है कि गाँवों और छोटे शहरों वाले 'भारत' में सब कुछ ठीकठाक चलता है. क्योंकि लाज और घर की नाक का लिहाज़ तोड़ कर औरतें बोल नहीं पाती कि उन्हें कब क्या चुपचाप पी जाना पड़ा. फिर भी जनाब, उन इलाकों में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध का ग्राफ़ कहीं से कम नहीं. हाँ, वहाँ सब चुपचाप निपटा दिया जाता है! लेकिन शहर की महिलाएँ बोलने लगी हैं, अपनी मौजूदगी हर जगह दर्ज कराने लगी हैं, इसलिए प्रभुजनों को अपना आसन डोलते हुए दिखने लगा है. हुज़ूर, अभी तो अपने देश में काम करनेवाली आबादी में महिलाओं का हिस्सा 22 फ़ीसदी से कुछ ही ज़्यादा है और इस मामले में 131 देशों में भारत नीचे से 11वें नम्बर पर है. अगर अभी से आप दुबले होने लगे, तो तब क्या होगा जब महिलाएँ नौकरी में आधा हिस्सा माँगेंगी. आपकी सूचना के लिए बता दें कि नार्वे में कामकाजी आबादी में महिलाओं का हिस्सा 69 प्रतिशत है. तो कुँए से बाहर निकल कर देखिए कि आसमान का विस्तार कितना अनन्त है!
(लोकमत समाचार, 30 नवम्बर 2013)

Saturday, 23 November 2013

कहिए और लड़िए ताकि भविष्य निराश न हो!

यह संस्थाओं के ध्वस्त होने का समय है! विश्वासों और सम्बलों के आख़िरी बचे-खुचे कुछ पायदानों के चरमराने-दरकने-धसकने का वर्तमान बीतने को है, सब कुछ भरभरा कर ढह जाने का भविष्य बस जैसे आ टपकने की ही घात में है. लोकतंत्र के चार खम्भे! दो बस अब ढहे, तब ढहे. अफ़सरशाही और नेताशाही से किसी को शायद ही कोई उम्मीद हो. बाक़ी बचे दो, अदालत और मीडिया. गिरते-पड़ते भी इनकी साख से कुछ आस तो बची ही थी. वैसे ही जैसे डूबते को तिनके का सहारा! 
लेकिन पिछले एक हफ़्ते में दोनों पर बड़ा बट्टा लगा! देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सियों पर भी ऐसे लोग बैठ सकते हैं, जिन पर यौन शोषण के लाँछन लगें! फिर 'तहलका' के नामी-गिरामी सम्पादक तरुण तेजपाल पर अपने एक पत्रकार मित्र की बेटी और अपनी ही सहकर्मी पत्रकार पर यौन आक्रमण के आरोप से तहलका मच गया! 
इन दोनों मामलों में क्या होगा, दोषियों को सज़ा मिल पायेगी या नहीं, मिलेगी तो कितनी मिलेगी, आरोप साबित हो पायेंगे या वापस ले लिये जायेंगे, जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता रहता है! ये सब सवाल हैं. बहस जारी है. तेजपाल के 'प्रायश्चित' को दर्ज कर 'फ़र्ज़' पूरा कर लिया जाये या मामले को क़ानून के हाथों सौंपा जाये? अब तेजपाल 'इलीट' सम्पादक हैं, इसलिए बहस हो रही है! सुनते थे क़ानून सबके लिए बराबर होता है. किताबों में तो होता है, लेकिन बस पढ़ने के लिए! जब करने की बात हो तो बड़े आदमी के लिए क़ानून छोटा हो जाता है. जितना बड़ा आदमी, उतना बौना क़ानून! लेकिन तेजपाल साहब 'बड़े' हो कर भी शायद जल्दी नप जायें. इसलिए नहीं कि देश में अचानक सुराज आ गया, बल्कि इसलिए कि बारह साल से जली-भुनी बैठी बीजेपी के हाथ बटेर लग गयी. गोवा में उसकी सरकार है, अपराध गोवा में हुआ है, उसकी पुलिस ने मामला हाथ में ले लिया है. कम से कम बंगारू लक्ष्मण का बदला तो चुका ही लेगी बीजेपी! अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे! वैसे काँग्रेस ने भी तेजपाल की गिरफ़्तारी की माँग कर दी है. चुनाव का मौसम है! कोई पार्टी रिस्क नहीं ले सकती! यह सब राजनीति की चकल्लस अपनी जगह, पर इस मामले में दो राय नहीं हो सकती कि तेजपाल पर गम्भीर आपराधिक आरोप लगे हैं और क़ानून अपना काम करे, इसके अलावा और कोई बात क़ानून सम्मत नहीं हो सकती.
लोग सकते में हैं! अभी तक बड़ी अदालतों के कुछ फ़ैसलों पर कभी-कभी हैरानी होती थी, कभी-कभार कुछ बदरंग बातें भी इधर-उधर से छन-छना कर बाहर आ जाती थीं. मीडिया पर भी बड़े धब्बे लगे हाल के दिनों में. पेड न्यूज़ और बाज़ारूपन के अलावा राडिया टेपों ने कई बड़े नामों की क़लई उतार दी. यह अलग बात है कि उनमें से सभी अब भी वैसे ही जमे हुए हैं, इज़्ज़त की पूरी गठरी के साथ! लेकिन फिर भी लोगों को इन दोनों 'खम्भों', अदालत और मीडिया से कहीं न कहीं बड़ी आस थी. लेकिन अब इन दो मामलों ने कुछ और छिलके उतार दिये. नेताशाही अगर भ्रष्ट है, राजनीति अगर किसी भी स्तर तक गिर सकती है, तो उस पर लगाम कौन लगायेगा? सवाल कौन उठायेगा? किस मुँह से उठायेगा? कड़ुवे और तीखे सवाल पूछने का क्या नैतिक आधार होगा उसके पास? क्या उससे पलट कर सवाल नहीं पूछा जायेगा कि तुम कौन होते हो उँगली उठानेवाले, तुम्हारे कपड़ों पर भी सत्तर दाग़ हैं, जैसे हम, वैसे तुम. तुम भी खेलो हमारे साथ. हम चारो मौसेरे भाई! 
सबसे ख़तरनाक यही है. अफ़सरशाही, नेताशाही, न्यायपालिका और मीडिया अगर सब दुर्भाग्य से एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखने लगे, तब? कुछ नहीं बचेगा तब. बेचारगी में, लाचारी में लोग सड़कों पर उतरेंगे, उतरे भी थे पिछले दिनों, जनलोकपाल को लेकर और 'निर्भय' को न्याय दिलाने. 'निर्भय' आन्दोलन पूरी तरह सफल रहा. छोटी अवधि का था. लेकिन जनलोकपाल की लड़ाई लम्बी थी. कुछ ही महीनों में उसका शीराज़ा बिखर गया. आन्दोलन व्यवस्था पर बड़े दबाव बना सकते हैं, लेकिन लम्बे समय तक लगातार उन्हें चलाये रख पाना मुश्किल है. हल तो यही है कि अपनी संस्थाओं को सुधारने के लिए लगातार छोटे-छोटे दबाव बनते रहें. यौन शोषण के इन दोनों मामलों में यही हुआ. पीड़ित लड़कियाँ आगे आयीं.
 लड़ाई शुरू हुई. यह एक शुभ संकेत है. लोग अपनी बात कहने लगें, तो उसे सबको सुनना ही पड़ेगा. इसलिए निराशा छोड़िए, कहिए और लड़िए, ताकि भविष्य निराश न हो!
(लोकमत समाचार, 23 नवम्बर 2013)

Saturday, 16 November 2013

काला जादू और भेड़ बनीं सरकारों का तिलिस्म!

पैसा रे पैसा, तेरा रंग कैसा? आये चाहे जहाँ से, लगे न बिलकुल खोटा! एक पुराना गाना था, सत्तर के दशक की फ़िल्म 'शोर' का, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो, लगे उस जैसा. सचमुच पानी का कोई रंग नहीं होता. जिस रंग को पानी में डाल दीजिए, वह उसी रंग का हो जाता है. लेकिन पैसे के कम से कम दो रंग तो होते हैं, यह बात तो पूरी दुनिया जानती है. एक सफ़ेद और दूसरा काला. और आजकल तो बच्चों तक को पता है बन्धु कि काला पैसा कितने तरह का होता है, जैसे टैक्स चोरी का पैसा, अंडरवर्ल्ड और आतंक का पैसा, ब्लैकमेलिंग का पैसा, विदेशी पैसा वग़ैरह-वग़ैरह.

और आजकल काले धन को वापस लाने को लेकर ख़ूब हल्ला मचा है. एक योगी बाबा योग छोड़ कर काले धन की थाह पाने ऐसे आसन पर बैठे कि पुरुष से महिला वेशधारी हो गये और तीन दिन के अनशन में ही चूँ बोल गये! अपनी राजनीतिक पार्टी बनाते-बनाते अब वह मोदी जी के जयकारे लगा रहे हैं. रालेगण सिद्धि से चला एक और उत्साही सदा उपवासी जत्था था. देखते ही देखते वह कुछ इधर बँटा, कुछ उधर बँटा, कुछ कहीं टूटा, कुछ कहीं बिखरा, और आख़िर में 'आप' और 'बाप' बच गया. 'आप' वाले फ़िलहाल दिल्ली में चुनाव लड़ रहे हैं, 'बाप' लापता है! जिन्हें 'बाप' न समझ आया हो, वे गूगल सर्च कर लें!

इन सबको विदेशों से काला धन वापस लाना था. कहते हैं वहाँ के बैंकों में हज़ारों या कौन जाने लाखों भारतीयों का हज़ारों हज़ार करोड़ का काला धन जमा है. उसे वापस लाना है, कैसे आयेगा, किसी को पता नहीं. तेरी-मेरी-इसकी-उसकी हर छाप की सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, लेकिन काले धन के काले जादू से सब सरकारें भेड़ बन जाती हैं! वैसे भी अपने लोकतंत्र की महान परम्परा है, जब आप सरकार बहादुर हो तो बयानबहादुर बनो! बयान दो, देते रहो, देते रहो और जब विपक्ष में हो तो नारों के फुफकारे मारो, मारते रहो! जैसा कि आजकल अपने नमो जी कर रहे हैं. इधर वह इतने फुफकारे मार रहे हैं कि उन्हें स्मृति लोप होने लगा है. वह अपने ही नेताओं के नाम भूलने लग गये! ऐसे ही एक दिन उन्होंने बड़े ज़ोर की हुँकार लगायी कि सरकार काले धन पर श्वेत पत्र क्यों नहीं लाती? कुछ ही घंटों बाद मीडिया ने उन्हें बता दिया कि अभी साल भर पहले ही सरकार काले धन पर श्वेत पत्र ला चुकी है. अब क्या वह हर महीने श्वेत पत्र लाये? वैसे कहते हैं कि झूठ सफ़ेद होता है. श्वेत पत्र सुन कर पता नहीं क्यों यह सफ़ेद झूठ वाला मुहावरा याद आ गया!

बहरहाल, इस कथा का मर्म यह है कि जो जब तक सरकार में नहीं रहता, वह काले धन को वापस लाने के लिए ख़ूब मचलता है, क्योंकि उसे मालूम है कि वह सिर्फ़ हल्ला मचाने का नाटक ही करता है. और सरकार तो कुछ करेगी ही नहीं. अब आप इतने भोले तो नहीं ही होंगे कि आपको बताना पड़े कि क्यों सरकार कुछ करना नहीं चाहती!

वैसे इधर काले धन का मामला ज़रा ठंडा पड़ा था. 'आप' यानी आम आदमी पार्टी को मिलने वाले विदेशी चन्दे का मामला न उठा होता, तो शायद हम यह चर्चा न कर रहे होते. आरोप लगा कि 'आप' को विदेश से बेनामी चन्दे मिल रहे हैं. 'आप' ने कहा कि उसकी वेबसाइट पर हर चन्दे का पूरा ब्यौरा मौजूद है. लेकिन सरकार ने कहा कि वह 'आप' को मिल रहे पैसे की जाँच करायेगी. क्या मज़ाक़ है? 'आप' का मामला तो कुछ लाख रुपयों का ही है, काँग्रेस, बीजेपी और तमाम दूसरी पार्टियों के तो हज़ारों करोड़ के चन्दे का कहीं कोई हिसाब नहीं है, कहाँ से आया, किसने दिया, देशी पैसा है कि विदेशी, किस काम से कमाया काला धन है, कोई ब्यौरा नहीं. और करोड़ों का चन्दा उगाहने वाली ये तमाम पार्टियाँ आरटीआइ का विरोध करती हैं, ताकि किसी को पता न चले कि इन्हें पैसा कहाँ से मिलता है? एक क़ानून और बना दिया है. बीस हज़ार से कम के चन्दे का कोई ब्यौरा रखने की ज़रूरत नहीं! काले को सफ़ेद करने का भला इससे आसान रास्ता क्या हो सकता है? तो जब ये तमाम पार्टियाँ ही बेशर्मी से काले धन की उगाही में जुटी हैं तो ये काले धन को भला क्यों ख़त्म करना चाहेंगी? आप अब भी न समझें और बेवक़ूफ़ बनते रहें तो बेचारी इन पार्टियों का क्या दोष?
(लोकमत समाचार, 16 नवम्बर 2013)

Thursday, 14 November 2013

अन्ना से मोदी तक, हम सब एक हैं!

आप चाहे आप हों, अन्ना हों, वीपी हों, आडवाणी हों, मोदी हों या चाहे भी जो कुछ हों, सबके सब एक ही अनार के लिए बीमार क्यों हुए जाते हैं? नाम बड़े किसिम-किसिम के, लेकिन दर्शन वही खोटे! ऐसा लगता है कि ये जनता ही कोई ऐसी सम्मोहनी सुन्दरी है कि जो एक बार इसके फेर में पड़ता है, बस लट्टू हो जाता है! अब अपने केजरीवाल साहब को ही देखिए. लोकपाल लीला की चकल्लस चखते ही जनता की मोहिनी माया में फँस गये. राजनीति में उतरे. बोले, राजनीति की सफ़ाई करनी है. झाड़ू चाहिए. लगा कि भई, वाक़ई बड़ा दमदार बन्दा है. चुनाव निशान चुना तो झाड़ू. सचमुच यह राजनीति की सफ़ाई करके ही मानेगा. लेकिन क्या पता था कि वह भी उसी गटर में गिर जायेंगे, जहाँ के कीचड़ में लोटने-पोटने को हर कोई ललक रहा है! सो केजरीवाल साहब बरेली जा कर आला हज़रत मौलाना तौक़ीर रज़ा ख़ान साहब के दरवाज़े सजदा कर आये! मौलाना साहब सुन्नी मुसलमानों के बरेलवी पंथ के सबसे बड़े नेता हैं और कांग्रेस, बीएसपी से होते हुए फ़िलहाल समाजवादी पार्टी के साथ हैं. इन पर मुसलमानों को दंगों के लिए उकसाने के संगीन आरोप लग चुके हैं. तसलीमा नसरीन और जार्ज बुश का सिर क़लम कर दिये जाने की पैरवी मौलाना साहब बड़े ज़ोर-शोर से कर चुके हैं. लेकिन केजरीवाल जी को मुसलिम वोटों की चिन्ता तो करनी ही पड़ेगी न!

ये मुए वोटों की भंग ऐसी चढ़ी कि केजरीवाल साहब की याद्दाश्त पर ढक्कन लग गया. कुछ याद न रहा कि तौक़ीर रज़ा साहब क्या-क्या कर चुके हैं. न ही उनके बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, रिसर्चजीवी सिपहसालारों में से किसी की दूरबीन कुछ देख पायी. सच ही कहा है किसी ने प्रेम अन्धा होता है! हमने आज अपनी आँखों से देख लिया कि वोटों का प्रेम बड़ी-बड़ी दूरबीन दृष्टियों को भी अन्धा कर देता है. बड़े-बड़े भलेमानुस, बड़े-बड़े सिद्धाँतवादी सिद्ध जन भी वोटों की रति से ललच कर बरसों से ओढ़े ब्रह्मचर्य की कथरी को बिन सकुचाये-लजाये उतार कर डुबकी लगा लेते हैं!

उधर, बेचारे नमो भाई को मन मार के मुसलमानों से प्रेम जताना पड़ जा रहा है. अपनी सभाओं में टोपियों और बुरक़ों की नुमाईश करनी पड़ रही है. अब यह अलग बात है कि कभी-कभी ज़बान फिसल जाती है और मुँह से 'पिल्ला' निकल पड़ता है! मोदी साहब का यह नया-नया इश्क़ देख कर शिव सेना दुःख से दुबली हुई जा रही है!

कुछ बरस पहले उन्हीं के 'भीष्म पितामह' आडवाणी जी तो अपनी 'हार्डलाइनर' की छवि धोने के चक्कर में जिन्ना को सेक्यूलर बताने का ऐसा पाप कर बैठे कि पूरे राजनीतिक जीवन की सारी कमाई ही गँवा बैठे. गये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास!

थोड़ा और पीछे 1988 में चलते हैं. भ्रष्टाचार का ही मुद्दा लेकर वी. पी. सिंह केन्द्र सरकार से अलग हुए थे. जनमोर्चा बना था. कहा गया कि जनमोर्चा दस साल तक राजनीति में नहीं उतरेगा. बहरहाल, कुछ ही दिन बीते होंगे कि वी. पी. सिंह ने तय किया कि वह इलाहाबाद से उपचुनाव लड़ेंगे. एक तरफ़ भाजपा समेत पूरा संघ परिवार वी. पी. सिंह के साथ लगा था, दूसरी तरफ़ सैयद शहाबुद्दीन की लिखित अपील मुसलमानों के बीच बँटवायी जा रही थी. हो गया न पूरा सेक्यूलर प्रचार! और जब जनमोर्चा के एक और संस्थापक सदस्य आरिफ़ मुहम्मद ख़ाँ वहाँ पहुँचे, तो वी. पी. सिंह के चुनाव मैनेजरों ने उन्हें प्रचार ही नहीं करने दिया. डर था कि शाहबानो मामले में आरिफ़ के स्टैंड के चलते मुसलमान कहीं बिदक न जायें!

चलिए, ये सब तो वोट के बौराये हुए लोग हैं, लेकिन अन्ना जी को क्या हुआ था? अभी कुछ दिन पहले तक जनरल वी. के. सिंह को चिपकाये-चिपकाये घूम रहे थे. देश की तसवीर बदलते-बदलते सिंह साहब ने रातोंरात पाला बदल लिया. अब वह नरेन्द्र मोदी से नैन-मटक्का कर रहे हैं और अन्ना बेचारे हाथ मल रहे हैं! ऐसे ही एक ज़माने में अन्ना जी बाबा रामदेव पर लहालोट हुआ करते थे क्योंकि रामदेव उनके लिए भीड़ जुटवा सकते थे. रामदेव कितने विवादों में घिरे रहे थे, यह किससे छिपा है. रामदेव भी अब मोदी के धुरन्धर ध्वजारोही हैं!

हमने यहाँ उन पार्टियों का नाम जानबूझकर नहीं लिया जिन पर बीजेपी 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का लेबल लगाती है. यहाँ बात सिर्फ़ उनकी है, जिन्होंने मौसम देख कर कोट बदल लिए! काहे का उसूल, काहे की विचारधारा, सब कहने की बातें हैं. इनका एक ही उसूल है, वोट मिले, भीड़ मिले, बाक़ी सब जाय भाड़ में! अपनी-अपनी रंग-बिरंगी टोपियों के नीचे सब एक ही रंग के अवसरवादी हैं. अन्ना से मोदी तक, हम सब एक हैं!
(लोकमत समाचार, 9 नवम्बर 2013)

रोशनी का अँधेरा और सच की चाँदनी!


यह रोशनी के अँधेरे का दौर है! जी हाँ, कभी-कभी रोशनी भी अँधेरा कर देती है. जब आँखें चौंधिया जायें, तो कुछ भी दिखना बन्द हो जाता है! आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है. यही होता है रोशनी का अँधेरा! इस दीवाली अचानक यह महसूस हुआ कि चारों तरफ़ रोशनी की इतनी चकाचौंध है कि चीज़ों की सही शक्लें दिखती ही नहीं, ज़िन्दगी के असली रंग दिखते ही नहीं.
आज तो बड़े-बड़े रोशनी भरे शो रूमों का ज़माना है. कुछ साल पहले तक छोटी-छोटी दुकानें हुआ करती थीं. ग्राहक न हो तो मामूली बल्ब टिमटिमाते रहते थे. उन दिनों लोग एक-एक यूनिट बिजली ख़र्च करने से पहले दस बार सोचते थे! कोई ग्राहक आता तो चीज़ें दिखाते-दिखाते दुकानदार अचानक फ़ोकस लाइटें जला देता था और चीज़ें जगमगा उठती थीं. अकसर ऐसा हुआ कि रोशनी के इस झाँसे में कोई कपड़ा बहुत पसन्द आ गया, ख़रीद लाये, बाद में दिन की रोशनी में देखा तो पता चला कि इसका रंग वैसा नहीं है, जैसा कल दुकान की झकाझक रोशनी में दिखा था. एक-दो बार ऐसे ठगे गये तो आदत बना ली कि दिन के उजाले में ही चीज़ें ख़रीदेंगे ताकि रोशनी के फ़रेब में न फँसें!
आज की पीढ़ी ने शायद कभी यह महसूस न किया हो कि चमचम रोशनी कैसे ठगती है! वैसे भी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया के मकड़जाल से बाहर की असली दुनिया भला कब दिख पाती है? सुपरफ़ास्ट सूचनाओं की रेलमपेल और सोशल नेटवर्किंग के 'एमोटीकाॅन' के भँवर में जब सारा संवाद अटक जाय और व्यक्ति का समूचा संसार एक कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट या मोबाइल फ़ोन में सिमट जाये तो आपकी पहुँच ग्लोबल ज़रूर हो जाती है लेकिन अपना घर, अपनी गली, अपने रिश्ते, अपने लोग, अपनी धूप, अपनी हवा, अपना दिन, अपनी रातें, अपनी सुबह, अपनी शामें ---यह सब एहसासों की छुअन से कहीं बहुत दूर हो जाता है.
जितनी ज़्यादा रोशनी, उतना ही ज़्यादा बड़ा झाँसा और उतना ही बड़ा ख़तरा कि हम चीज़ों के आकार-प्रकार, रंग-रूप न पहचान पायें, न समझ पायें, न महसूस कर पायें. लालटेन दौर के बाद जब शहरों में पहली बार बिजली आयी थी, तो कमरे में 40 वाॅट का बल्ब भी आँखों को चौंधिया देता था. ऐसा लगता था कि इतनी रोशनी का क्या करें! दिया-बाती से 40 वाॅट के बल्ब तक आने के बहुत दिनों बाद तक भी रातों को चाँदनी पूरी शान-ओ-शौकत से नहलाती रही थी, घनघोर गरमी में भी चाँदनी मन को ठंडक दे देती थी, तारों भरा आसमान दिल के तारों को झनझना दिया करता था. आज चाँदनी लापता हो चुकी है और तारे मुश्किल से नज़र आते हैं, बिलकुल इक्का-दुक्का, जैसे अँधेरे के जंगल में रास्ता भटक गये हों.
जब रोशनी कम थी तो उजाला ज़्यादा था. तारे, चाँदनी, परछाईं ये सब आपके साथ चला करते थे. आज दानवी रोशनी ने इन सब को निगल लिया है. दीपावली है, लेकिन दीयों की क़तारें नहीं. आख़िर कौन इतने सारे दीयों को जलाने में वक़्त बरबाद करें और थोड़ी-थोड़ी देर में उनमें तेल या घी भरता रहे. आज एक स्विच आॅन करने से हज़ारों-हज़ार झालरें और लड़ियाँ जगमगा उठती हैं. फिर दीयों के झंझट में कौन पड़े. सही है. लेकिन कभी सोच कर देखा है कि दीयों के साथ जो जतन करना पड़ता था, उससे आत्मीयता जो का रिश्ता जुड़ता था, मंद-मंद हवाओं में उनकी लौ को इतराते-इठलाते देख कर जो एहसास होता था, क्या वही कुछ सुख हज़ारों-हज़ार झालरों से मिलता है?
बात सिर्फ़ दीवाली की रोशनी की नहीं है. जीवन के हर कोने-अतरे में ठसाठस भर आयी चकाचौंध की है. घर, बाज़ार, शॉपिंग माल, साइन-बोर्ड, होर्डिंग---हर जगह राक्षसी रोशनी का सम्मोहक रति-नृत्य! बड़े-बड़े विशाल विज्ञापन, अरबों-करोड़ों का प्रचार, तेल-साबुन बेचते हुए हीरो-हीरोइनों, क्रिकेटरों की फ़ौज, सौन्दर्य के सारे प्रतिमानों को लजा देने वाली कमनीय पैकिंग, रोशनी का एक ऐसा वशीकरण तंत्र कि लोग सुध-बुध खो बैठें! ठीक. लेकिन पैकिंग की परतों के भीतर माल भी उतना ही चोखा निकलता है क्या? अब सोचिए कि रोशनी का अँधेरा हम सबको कैसे ठग रहा है. सूचनाओं का अन्तहीन समंदर चारों तरफ़ पसरा है, चकाचौंध रोशनी में सच की चाँदनी ग़ायब है. क्या हम पल भर रुकेंगे, थमेंगे, जगेंगे, सोचेंगे कि चाँदनी और रोशनी के अँधेरे के बीच हम क्या चुनें?
(लोकमत समाचार, 2 नवम्बर 2013)

जादूगर, जीडीपी और प्याज़ का उड़न छू होना !

अजब देश है अपना. पता नहीं क्या बात है कि प्याज़ बिना गाड़ी चलती नहीं हमारी! सदियों पुराने ज़माने से यह प्राणप्यारे जियादुलारे प्याज़ का कृतज्ञ रहा है. तब जिसके नसीब में कुछ नहीं होता था, उसे प्याज़-रोटी तो नसीब थी! माबदौलत राजा-महाराजा लोग प्याज़ की बदौलत ही चैन की नींद सोया करते थे. चलो ग़रीबों को कुछ मिले न मिले, पेट भरने के लिए प्याज़ और रूखी-सूखी रोटियाँ तो मिल ही जायेंगी! प्रजा ख़ुश रहेगी और राज्य से लेकर राजमहल तक शान्ति रहेगी. बग़ावत का डर नहीं होगा, जब तक ग़रीबों को प्याज़ मिलता रहेगा!
अब लगता है कि समय सचमुच बदल गया है. ग़रीब तो सपने में भी प्याज़ देख पाने का सपना नहीं देख सकता! प्याज़ तो एक मायावी इन्द्रजाल बन चुका है! करोड़ों-अरबों कमाने का जादू! एक बड़ा जादूगर है, जो जादू दिखाता है और प्याज़ देखते ही देखते छू मंतर हो जाता है. सब भौंचक्के! अभी तो चारों तरफ़ प्याज़ का इतना अम्बार लगा था. लाखों टन प्याज़! फिर यह कैसा ग़ज़ब जादू था कि वह आँखों से ओझल हो गया? अब जनाब जादू है तो सब सम्भव है. पहले दालों पर यही जादू चला था, चीनी पर चला था, अब जादूगर का दिल प्याज़ पर आ गया है. जब वह खेल दिखाता है और मंतर मारता है, अक्रा बक्रा बम्बे बो गड़प, तो चीज़ ग़ायब! अब ढूँढते रहो, चाहिए तो जेब ढीली करो! फिर सब बोलते हैं त्राहिमाम, त्राहिमाम! रोते-रोते पखवाड़े बीते, महीने बीते, जादूगर की जेब भर चुकी होती है. वह बोलता है अक्रा बक्रा बम्बे दो...दो...दो, और चीज़ हाज़िर!
बचपन में हमने बहुत जादू देखे, सोचते थे बस इन्द्रजाल सीख लो और चाहे जिसको बकरा बना दो! बड़े हुए तो पता चला कि ये जादू-वादू तो कुछ होता ही नहीं है. सब ट्रिक है बन्धु! अपनी ही आँखों का छलावा! हम तो बड़े हो गये, समझदार हो गये, जादू की पोल-पट्टी जान गये, सो अब उसके झाँसे में नहीं आते. पर बेचारी यूपीए सरकार! अभी कुल नौ साल की ही तो है. बिलकुल बच्चा है जी! सो वह तो जादूगर से बहुत डरती है. पता नहीं कब वह उसे बकरा बना दे और डकार जाये या फिर हमेशा-हमेशा के लिए मक्खी बना कर उड़ा दे! सो पिछले पाँच साल से वह डरी-डरी यह उड़न छू वाला जादू देख रही है. दाल ग़ायब, चीनी ग़ायब, प्याज़ ग़ायब! जादूगर तो दादी अम्मा की कहानियों जैसा बड़ा ख़तरनाक और सरकार एक छोटा-सा बच्चा! भला कहाँ मुक़ाबला है दोनों का. इसलिए जब जादूगर जादू दिखाता है, तो सरकार गिड़गिड़ाने लगती है, हे जादूगर तेरी जेब की प्यास भर गयी हो तो अब हमारी जान बख़्श दे! आख़िर जादूगर का दिल पसीजता है! जी हाँ, उसके पास जेब के साथ-साथ दिल भी है. उसे दोनों का ख़याल रखना पड़ता है. आख़िर ग़ायब हुआ सामान लौट आता है. बच्चो बजाओ ताली!
आज ही एक अख़बार में पढ़ रहा था कि पिछले दस सालों में प्याज़ का उत्पादन 42 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर क़रीब 163 लाख मीट्रिक टन हो गया, यानी क़रीब-क़रीब चार सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. जबकि 2003 में हमारी आबादी 1.05 अरब थी, जो दस साल बाद अब 1.23 अरब है. यानी दस साल में कुल क़रीब 18 प्रतिशत बढ़ोत्तरी. तो बताइये इतना प्याज़ जाता कहाँ है. हर आदमी सब कुछ छोड़ कर सिर्फ़ प्याज़ ही खा रहा है क्या? आबादी सिर्फ़ 18 प्रतिशत बढ़े और उत्पादन 400 प्रतिशत और फिर भी बाज़ार में प्याज़ में न मिल रहा हो! ऐसा अद्भुत चमत्कार हमारे ही देश में हो सकता है.
न हमारे यहाँ कभी दालों का उत्पादन घटा था, न गन्ने का और न प्याज़ का. फिर भी पिछले पाँच सालों में इनका अभूतपूर्व संकट देश में कैसे खड़ा हो गया? किसी के पास कोई जवाब नहीं है! यह भ्रष्टाचार का नवीनतम आविष्कार है. माल छिपाओ, दाम बढ़ाओ और लूटो. पाँच साल से यह सिलसिला चल रहा है. हर बार सरकार बस टुकुर-टुकुर देखती रहती है. राजाओं-महाराजाओं के दौर में न जीडीपी थी, न विकास दर की चिड़िया, लोग अकाल और महामारी से भले मरते हों, लेकिन प्याज़ सोने जैसा क़ीमती शायद कभी नहीं था. वरना बेचारे ग़रीब प्याज़- रोटी कैसे खाते? कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही राजा होती है, होती होगी. लेकिन एक सरकार और कुछ जादूगर भी होते हैं न!
(लोकमत समाचार, 26 अक्तूबर 2013)

Wednesday, 13 November 2013

काजल की कोठरी, चतुर सुजान और 'बेदाग़' निकलने का मंतर

पता नहीं जिन्न सचमुच में होते हैं या नहीं. हों या न हों, लेकिन कहते हैं कि जिन्न कभी मरते नहीं. बोतल में बन्द करके समंदर में फेंक दो या कुछ भी कर दो, कभी न कभी वे फिर निकल आते हैं. राडिया टेपों का जिन्न भी एक बार फिर निकल पड़ा है. जब पहली बार निकला था, तब बड़ा गुल-गपाड़ा मचा था. राजनीति, उद्योग, लाॅबीइंग के  भ्रष्ट त्रिकोण की एक छोटी-सी झलक तब दिखी थी. सत्ता के गलियारों में कैसे काम बनवाया-बिगड़वाया जाता है, कैसे कहाँ किसकी गोटियाँ फ़िट करायी जाती हैं, अख़बारों और मीडिया में क्या छपे और दिखे, सरकार बन रही तो कौन किस विभाग का मंत्री क्यों बने, और जाने क्या-क्या! देश ने पहली बार देखा कि ये राजकाज सचमुच चलता कैसे है. यह सब देख लोगों की आँखें खुली की खुली रह गयीं. बड़े-बड़े नाम सामने आये, मीडिया के भी नाम! फिर सब कुछ लीप-पोत बराबर हो गया. राजकाज फिर बदस्तूर चल पड़ा. सबने सबको बड़ी इज़्ज़त से बचा लिया!
लेकिन बोतल से जिन्न एक बार फिर बाहर निकला है. पूरा नहीं, बहुत थोड़ा-सा! सुप्रीम कोर्ट ने राडिया टेपों के पहाड़ में से कुछ मुद्दे और मामले ढूँढ निकाले हैं. अब उनकी जाँच होगी! कोर्ट को साफ़-साफ़ लगता है कि राडिया टेपों का मामला सिर्फ़ सिर्फ़ 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन तक ही नहीं था. बल्कि यह राजनेताओं, सरकारी अफ़सरों और उद्योगपतियों के बीच बहुत गहरी गिरोहबन्दी का भंडाफोड़ है, जिससे पता चलता है कि निजी फ़ायदों के लिए दुष्चक्र कैसे गढ़े जाते हैं, भ्रष्टाचार के हमाम में सब एक साथ कैसे नहाते हैं, ऊँची-ऊँची नियुक्तियाँ कैसे होती हैं, काम निकलवाने के लिए करोड़ों की थैलियाँ कैसे इधर से उधर होती हैं, और कुछ मामलों में ऊँची अदालतों के फ़ैसलों को प्रभावित करने के लिए क्या खेल खेले गये.
कोर्ट ने फ़िलहाल सभी मामलों को अभी गुप्त रखा है, क्योंकि सब बड़े-बड़े नाम, बड़ी-बड़ी इज़्ज़त वाले लोग हैं. पहले जाँच हो और पता चले कि इन मामलों में कुछ सबूत मिल पायेंगे या नहीं, कोई क़ानूनी कार्रवाई हो सकती है या नहीं. सीबीआई को कुछ ठोस सबूत मिलेंगे, तो मामला कुछ आगे बढ़ेगा, वरना टाँय-टाँय फिस्स! अब ये सब जानते हैं कि सीबीआई को सबूत कब मिलते हैं और कब नहीं 'मिल पाते' हैं और कब 'मिल कर भी नहीं मिल पाते' हैं! जब रही भावना जैसी, केस की मूरत सीबीआई देखी तिन तैसी! कभी राजनीति की ज़रूरतें, कभी कोर्ट का डंडा, कभी सीबीआई की अपनी मनमर्ज़ी, इनमें से जब जैसी लगाम हो, केस का घोड़ा वैसे ही चलेगा. अब दूर क्यों जाते हैं. अपराध के दो मामले देखिए. आरुषि तलवार हत्याकांड और निठारी में बच्चों की हत्या, यौन शोषण और मानव माँस भक्षण के मामले. कोई बहुत बड़े-बड़े 'पाॅवर' वाले लोगों का मामले नहीं थे ये. लेकिन जाँच कैसे चली, जाँच ने कब-कब कितनी कितनी पलटियाँ खायीं, सबके सामने है. कभी सबूत नहीं मिले, कभी मिल गये! है न कमाल की बात!
तो फिर इन टेपों के जिन्न के दोबारा निकलने से क्या होगा? कह नहीं सकते! और अभी तो बहत्तर हज़ार टेपों में से सिर्फ़ अठारह हज़ार को सुना जा सका है. बाक़ी कहाँ-कहाँ क्या दबा पड़ा है, कौन जानता है? जब पहली बार टेप मीडिया में लीक हो गये थे, तब बहुत-सी बातचीत छप गयी थी. क़ानूनी कोई मामला बन पाया हो या न बन पाया हो, कई मामलों में नैतिकता का संकट तो खड़ा हो ही गया था. अब यह अलग बात है कि आज के ज़माने में चतुर सुजानों ने काजल की कोठरी से 'बेदाग़' निकल आने का मंतर ढूँढ लिया है. सो किसी का बाल भी बाँका नहीं हुआ.
अपन बरसों से देख रहे हैं. भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले आये और गये. काजल की कोठरियों से लेकर काजल के बड़े-बड़े भूत बंगले खड़े हुए. जाँच बैठी, अदालतें लगीं. साबित कुछ भी नहीं हुआ. जनता बेचारी के बस में बस टुकुर-टुकुर देखना ही बचा है. वह इन्तज़ार कर रही है कि एक दिन लोकपाल आयेगा और सब ठीक हो जायेगा. अन्ना के जन लोकपाल का दम तो निकल चुका है. अब जो परकटा लोकपाल आयेगा (अगर वह वाक़ई आ सका तो), वह फड़फड़ा भर भी ले तो तसल्ली करके चुप बैठियेगा. राजकाज तो जैसे चलता है, चलता रहेगा!
(लोकमत समाचार, 19 अक्तूबर 2013)